Wednesday, September 12, 2018

ग़ज़ल

जो सोचा है वही पुरकैफ़ मंज़र बन के रह जाये
मेरी ख़्वाहिश है वो मेरा मुक़द्दर बन के रह जाये

मज़ा जब है के तेरे  हिज़्र में मेरा हरेक आँसू
निकलकर आँख से पलकों  पे गौहर बन के रह जाये

मैं जिसको पूजती रहती हूँ अपने दिल के मंदिर में
वो मनमोहन कहीं मेरा ना पत्थर बन के रह जाये

दुआ करती हूँ रोजो शब ऐ  मेरी  जान  के मालिक
जिसे कहते हैं घर ऐसा मेरा घर बन के रह  जाये

जिसे जूड़े में  मैं अपने सजा लूँ ऐ मेरे मालिक
तमन्ना है वो इक ऐसा गुलेतर बन के रह जाये



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