Friday, August 3, 2018

तुम एक मौसम ही तो थे (कविता)

तुम्हारे आते ही मुरझाये फूल खिल उठते थे
तन में सोया मन जाग  जाता था
मन की बगिया में सुरभित बयार अटखेलियां करने लगती थीं
तन मन में उमंग की रंगोलियां सजने लगती थीं
और मैं समझती थी कि बसंत की बहार आ गयी
तुम्हारे ज़रा से स्पर्श से वर्षों की जमी बर्फ
 पल भर में पिघलने लगती थी
रात  रानी भी  दिन में ही महक जाती थी
मन के प्यासे काले बादल अपनी ही  खायी
कसम तोड़ कर खुद पर ही बरसने लगते थे
और मैं समझती थी की सुहानी वर्षा ऋतु आ गयी
तुम्हारे ज़रा से नाराज़ होते ही तन मन रेगिस्तान हो उठता था
गर्म हवाएँ सायं सायं की ध्वनि से
उजड़े जीवन का करुण संगीत सुनाने लगती थीं
मन जलता हुआ अंगार और तन उसपर रखी
 गर्म खाली हांड़ी की तरह तड़क उठता था
और मैं समझती थी की यही भीषण ग्रीष्म ऋतु है महा दुर्भिक्ष है
इसी तरह तुम्हारी दी हुई ऋतुओं से
 मेरी उम्र गुज़रती रही और तुमने गुज़रने दी
कितने सावन बीते कितने बसंत रंगहीन हुए
कितने बदल बरसे कितनी आग बरसी पता ही नहीं चला
 मैं भीगती सूखती रही मैं गुलाल उड़ाती रही मैं रस बरसाती रही
 मैं तड़पती भी  रही मैं उजड़ती ही रही
तुम्हारे सावन थे तुम्हारी  बसंत थी
 तुम्ही आग थे तुम्ही बादलों की बारिश भी और मैं धरती
जब तक तुमने चाहा ऋतुओं का आना जाना चलता  रहा
और मैं सब समझते हुए भी  इसे अपने  प्रति  तुम्हारा अपना प्रेम समझती रही
मगर तुम सदा के लिए कभी  मेरे नहीं हुए
तुम तो सिर्फ एक  मौसम थे और एक  मौसम ही रहे।
 बार बार आते रहे जाने के लिए
 हर  बार, न जाने कितनी बार
तुम एक मौसम ही तो थे