Saturday, September 14, 2019

ग़ज़ल

बहार आ के न जाने किधर से गुज़री है
खिज़ा हमारे तो दीवारो दर से गुज़री है।
किए पे अपने पशेमॉ नज़र वो आई हमें।
अभी अभी जो शराफ़त इधर से गुज़री है।
ये और बात के हम पर असर न कर पाई,
हवा ए गर्म हमारे भी घर से गुज़री है।
हमारे पास घड़ी भर को बैठिए साहिब,
हमारी सोच किताबी असर से गुज़री है।
अनीता पुरखों की टोली की बात क्या कहिए,
जिधर