Monday, October 15, 2018

ग़ज़ल - दर्द की रात को तुमने कभी घटते देखा

फूल के जिस्म से तितली को लिपटते देखा 
रंग और रूप को आपस में सिमटते देखा 

याद आया है मुझे वस्ल का आलम अपना 
जब भी लहरों को किनारों से लिपटते देखा 

दर्द के मारे हुए लोगों से मैं पूछती हूँ 
दर्द की रात को तुमने कभी घटते देखा 

आदमियत ने मेरी खून के आंसू रोये 
जब भी मज़्लूम पे ज़ालिम को झपटते देखा 

अबके भी नाम थे सोहकारों के फसलों पे लिखे 
अब के भी फ़सलों को सोहकारों में बंटते देखा 

जिनके हाथों में रहा अम्न का परचम सोनी 
उनके हाथों ही से इंसान को कटते देखा 


ग़ज़ल - आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक

शाम से इक इनायत की नज़र होने तक 
मुंतज़िर तेरे रहे हम तो सहर होने तक 

मुख़्तसर पल है जिसे ज़ीस्त कहा जाता है 
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक 

लज़्ज़ते इश्क़ की इक शाख़ें गुलेतर की तरह 
 परवरिश कीजियेगा दर्दे जिगर होने तक 

हिज़्र की शब में तेरी याद बसा कर दिल में 
शम्अ से जलते रहे हम तो सहर होने तक 

ए ग़मे दिल मेरी ठहरी हुई सांसों का इलाज 
तू ही कुछ करदे मसीहा को ख़बर होने तक 

सोचती रहती हूँ सोनी मैं यही शामों सहर 
राह  दुश्वार ना  हो ज़ादे सफ़र होने तक 

ग़ज़ल - अब मैं तेरे वजूद की पुख़्ता असास हूँ

ज़ीनत तेरे बदन की हूँ तेरा लिबास हूँ 
अब मैं तेरे वजूद की पुख़्ता असास हूँ 

माना के रात दिन मैं तेरे आस पास हूँ 
लेकिन तेरे सुलूक़ से हर पल उदास हूँ 

मेहरूम तेरे प्यास की लज़्ज़त से जो रहा 
मैं ही वो बदनसीब छलकता गिलास हूँ 

रंगीनिये जहान से महरूम मैं रही 
चरखे के पास जो न गया वो कपास हूँ 

तर्के ताल्लुक़ात के बारे में क्या कहूँ 
गिरते हुए मकान की सोनी असास हूँ  

ग़ज़ल - गुमां से भी नाज़ुक यकीं हम रहे थे

गुलाबों से बढ़कर हसीं हम रहे थे 
तुम्हारी नज़र में हमी हम रहे थे 

कभी याद बनकर कहीं दर्द बनकर 
तुम्हारे जिगर में कहीं हम रहे थे 

तुझे कुछ ख़बर है तेरी अंजुमन में 
गुमां से भी नाज़ुक यकीं हम रहे थे 

मुसाफ़िर जहाँ पर ठहरते नहीं हैं 
वही एक तपती ज़मी हम रहे थे 

जो ख़ाली पड़ा है सराये की सूरत 
उसी दिल के अंदर कहीं हम रहे थे 

ग़ज़ल - मेरी रातों का दो हिसाब मुझे

बेवफ़ा के सिवा जनाब मुझे 
और क्या देते तुम ख़िताब मुझे 

तुम वो ही हो जो रोज़ कहते थे 
एक खिलता हुआ गुलाब मुझे 

तुम समझते रहे हमेशा ही 
एक बोसीदा सी किताब मुझे 

हाथ रखिये न मेरे होंठों पर 
बोलने दीजिये जनाब मुझे 

तुमने ज़हमत न की सहारे की 
घेरे रहते थे जब अजाब मुझे 

तुम तो लिक्खे पढ़े से हो साहिब 
मेरी रातों का दो हिसाब मुझे 

होश बाक़ी नहीं रहे सोनी 
इस कदर अब पिला शराब मुझे 

ग़ज़ल - हरेक इंसान ख़ुशबू दे रहा है

तुम्हारा ध्यान ख़ुशबू दे रहा है 
यही लौबान ख़ुशबू दे रहा है 

करो पेहचान यारी दुश्मनी की 
हरेक इंसान ख़ुशबू दे रहा है 

गुलाबों से खिले हैं घाव दिल से 
तिरा अहसान ख़ुशबू दे रहा है 

महक पहुँची है उन तक मेरे दिल की 
मिरा अरमान ख़ुशबू दे रहा है 

मुहब्बत की वफ़ा की दोस्ती की 
ये हिंदुस्तान ख़ुशबू दे रहा है 

करप्शन है बहुत  लेकिन दिलों मैं 
अभी ईमान ख़ुशबू दे रहा है ग़ज़ल 

ग़ज़ल - चेहरे को मेरे मीर का दीवान मान लो

तुमको ख़ुदा बनाया मेरी जान मानलो 
कुछ तो मेरी निगाह का अहसान मान लो 

दुनिया की ये हवस न सताए तुम्हे कभी 
गर ख़ुद को चंद रोज़ का मेहमान मान लो 

क़िरदार पर वो दाग़ हैं जीना मुहाल है 
फिर भी ये ज़िद है साहिबे ईमान मान लाओ 

अपनी उदासियोंकी नुमाइश मैं क्या करूँ 
चेहरे को मेरे मीर का दीवान मान  लो 

इस मुल्क़ की भलाई फ़क़त एकता में है 
फ़िरक़ापरस्तों वक्त का फ़रमान मान लो 

झगड़े ये धर्म ज़ात के हो जाएँ तय अभी 
तुम सबको अपने जैसा जो इंसान मान लो 

सोनी चमन में फूल मयस्सर नहीं अगर 
ज़ख़्मों को ही बहार का वरदान मान लो 

ग़ज़ल - लिक्खी हैं मेरे दिल पे तेरी बातें बहुत सीं

याद आयीं किसी से जो मुलाक़ातें  बहुत सीं  
गुज़री मेरी आँखों से भी बरसातें बहुत सीं 

बैठूं जो सुनाने तो फिर इक उम्र गुज़र जाये 
लिक्खी हैं मेरे दिल पे तेरी बातें बहुत सीं  

ए चाँद ठहर रात के तू साथ ना जाना 
करनी है तेरे साथ अभी बातें बहुत सीं 

 कुछ दिन की जुदाई है सदा को नहीं बिछड़े 
बाक़ी हैं अभी अपनी मुलाक़ातें  बहुत सीं 

बाबा मेरा मुफ़लिस था  मैं बैठी रही घर में 
आयीं तो मेरे घर पे भी बारातें  बहुत सीं 

उन जागती रातों को भुलाऊँगी मैं कैसे 
गुज़री हैं तेरे बिन जो मेरी  रातें बहुत सीं 

लौट आएंगे परदेस से घर अबके वो सोनी
गुज़रेंगी अभी साथ में  बरसातें बहुत सीं  
  

ग़ज़ल - मैं ए मालिक किनारा चाहती हूँ

क़रीब आ प्यार का इज़हार कर दे 
मुझे छू ले  मुझे  गुलज़ार  कर दे 

मैं ए मालिक किनारा चाहती हूँ 
मेरे कच्चे घड़े  को पार कर दे 

चमकती है मेरे बालों में चांदी 
बहुत मुमकिन है वो इंकार कर दे 

अभी तक ख़्वाब  हूँ तेरी नज़र का 
मेरे मंज़र मुझे साकार कर दे 

वो जिसमे प्यार की खबरें  छपी हों 
मेरे चेहरे को वो अख़बार कर दे 

दुआ है लीडरों के हक़ में भगवन 
इन्हें  थोड़ा सा बा किरदार कर दे 

हमें  ख़ुश्बू बना दे ए  रचेता 
ये दुनिया बे दरो दीवार कर दे 

उदासी बन गयी मेरा  मुक़द्दर 
कोई आकर मेरा शृंगार कर दे 

मुहब्बत की वसीयत लिखने वाले 
मुझे भी इसमें कुछ हक़दार कर दे 

परींदे प्यार के कुछ उड़ रहे हैं 
ख़ुदा जाने वो कब लाचार कर दे 

सदा लड़ना अनीता उस हवा से 
जो सारे शहर को बीमार कर दे 

Sunday, October 14, 2018

ग़ज़ल -उकता के लड़कियों को न घर से निकालिये

ससुराल से दुखी थे मगर मुस्कुरा लिए 
पूछा जो माँ  ने हाल तो आँसू छुपा लिए 

ज़ेवर जो हो कोई तो उजलवा के पहन लें 
तकदीर हो सियाह तो  कैसे उजालिये 

रिश्ते हों बेटियों के तो कुछ देखभाल कर 
उकता के लड़कियों को न घर से निकालिये 

ताबीरें आप ढूंढ़ने आये हैं देर से 
अपने तमाम ख़्वाब हमीने जला लिए 

अब ये भी चाहते हैं मुहब्बत की बात हो 
 पहले तो तीर तंज़ के तुमने चला लिए 

 

ग़ज़ल - क्षमा मैं मांगती उससे अगर ख़ता करती

मैं कैसे अपनी कहानी की इप्तिदा करती 
तुम्हें ना माँगती रब से तो और क्या करती 

मेरी हया पे तुम्ही कल को तब्सरा करते 
जो लड़की हो के भी मैं अर्ज़े मुद्दुआ करती 

मैं सच कहूं मुझे तारीफ़ अच्छी लगती है 
वो चाँद कहते मुझे और मैं सुना करती      

दिनों के बाद वो लौटा तो खूब प्यार किया 
अब ऐसे प्यार के मौसम में क्या गिला करती 

बना के फूल वो ले जाता मुझको दफ़्तर में 
तमाम  दिन भी उसे ख़ुशबुएं दिया करती  

अब उसका काम है मुझको मना के ले जाना 
क्षमा मैं मांगती  उससे अगर ख़ता करती 

ये फूल मेरे लिए ही तो रोज़ खिलते हैं 
मैं इनसे प्यार ना करती तो और क्या करती 

न बाप ज़िंदा न घर में जहेज़ का सामान 
वो अपनी बच्ची को किस तरह से विदा करती 

वो भाई बहनों की रोटी की आस है सोनी 
वो क़त्ल करके उन्हें किस तरह विदा करती 



ग़ज़ल - सजा रही हूँ मैं आँसूं अभी तो कागज़ पर

 हसीन अजनबी आँखों का  ख़्वाब होने में 
लगेगा वक्त मुझे बेनक़ाब  होने में 

ज़रा सा दिल की लगी का भी हाथ होता है 
किसी के जीतने में कामयाब होने में 

सजा रही हूँ मैं आँसूं अभी तो कागज़ पर 
अभी तो वक़्त लगेगा किताब होने में 

सफर बहार का आसान ना समझना तुम 
बहुत से ज़ख़्म मिलेंगे गुलाब  होने में 

वो देख ले मेरे घर आके चांदनी का पड़ाव 
जिसे भी शक हो मेरे माहताब होने में 

ये जानते हुए वो आँख मूँद लेते हैं 
है किसका हाथ फ़िज़ा के ख़राब होने में 

हज़ारों आग के दरिया हैं दरमियाँ सोनी 
बहुत समय  है मुझे आफ़ताब होने में 



ग़ज़ल - धूप का आकाश जैसे माँ का आँचल हो गया

देखकर मुझको ह्रदय मौसम का चंचल हो गया 
होश खो बैठे हैं तारे चाँद पागल हो गया 

जाने कैसे प्यार उसका बन गया बिंदिया मेरी 
जाने कैसे वो मेरी आँख का काजल हो गया 

उससे था जन्मों का रिश्ता साथ कैसे छूटता 
मैं जो नदिया बन गयी वो प्यासा बादल हो गया 

फिर दुखों की राह में माँ की दुआ काम आ गयी 
धूप का आकाश जैसे माँ का आँचल हो गया 

आपके स्पर्श ने मुझको मुकम्मल कर दिया 
आपके छूने से सारा जिस्म संदल हो गया 

वो थे जब सोनी तो दिल का ये नगर आबाद था 
वो गए तो घर मेरा वीरान जंगल हो गया 

ग़ज़ल - औरत की ज़िन्दगी है ये इज़्ज़त की ओढ़नी

औरत की ज़िन्दगी है ये इज़्ज़त की ओढ़नी 
सिन्दूर प्यार का है मुहब्बत की ओढ़नी 

रेशम की ओढ़नी से है जोगन को क्या गरज़ 
 जब सर पे ओढ़ ली तेरी निस्बत१ की ओढ़नी 

बेटी बहन का माँ का बड़प्पन इसी में है 
उतरे न कभी सर से शराफ़त की ओढ़नी 

क़ुरबत की धुप खिलती है बारिश के बाद ही 
अश्कों से भीग जाने दे क़ुरबत२  की ओढ़नी 

हम बेघरों का दर्द क्या महसूस हो उन्हें 
सर पर पड़ी है जिनके ज़रा छत की ओढ़नी 

सुनते हैं रंग लाती है तब इश्क़  की हिना 
जब डूबती है ख़ून में चाहत की ओढ़नी 

सोनी बड़े बड़ों का ये अंजाम देख ले 
आख़िर में ओढ़ लेते हैं तुर्बत३  की ओढ़नी 

निस्बत१ - सम्बन्ध 
क़ुरबत२ - निकटता 
तुर्बत३ -  कब्र , समाधि 

ग़ज़ल - फूल हूँ मुझको महक जाने दे

ए हवा यार तलक जाने दे 
फूल हूँ मुझको महक जाने दे   

दिल की बेताबियाँ उसपर भी खुलें 
दिल धड़कता है धड़क जाने दे 

रोक पलकों पे ना अपने ऑंसू 
भर गए जाम छलक जाने दे 

इश्क़ में दोनों जलेंगे मिलकर 
आग कुछ और दहक जाने दे 

ज़ख्म इंसानों के भर दे मौला 
ये ज़मी फूलों से ढक जाने दे

देख खिड़की में खड़ी हूँ कब से 
चाँद अब छत पे चमक जाने दे 

तू फरिश्ता नहीं इंसा बन जा 
ख़ुद को थोड़ा सा बहक जाने दे 

ए मेरे कृष्ण तेरी राधा को 
एक ही पल को थिरक जाने दे 

लोग ख़ुद  तोड़ने आ जायेंगे 
प्यार का फल ज़रा पक जाने दे 

ग़ज़ल - दिल अगर नहीं मिलते दोस्ती अधूरी है

इंतज़ार मैं तेरे रात भी अधूरी है 
चाँद ना मुकम्मल है चाँदनी अधूरी है 

हँसते गाते शब्दों पर ओस पड़ गयी जैसे 
तुम नहीं तो लगता है शायरी अधूरी है 

उसने ये कहा मुझसे मैंने ये कहा उससे 
तेरे बिन अरे जानम ज़िन्दगी अधूरी है 

आओ साथ दो मेरा मद्ध्यम से पंचम तक 
इन महकती सांसों की रागिनी अधूरी है 

हाथ जब मिलाना हो दिल भी साथ रख लेना
दिल अगर नहीं मिलते दोस्ती अधूरी है 

फूल बनके महकेगी क्या हमारी आज़ादी 
ये काली तो बरसों से अधखिली अधूरी है 

ख़ूने दिल जला सोनी प्यार के चराग़ों में 
रौशनी तो है लेकिन रौशनी अधूरी है 







ग़ज़ल सोनी सब इंसानों की है इक जाती

पूछ रही है दीपक से हंस कर बाती 
हमको क्यूँ रातों को नींद नहीं आती 

उसके आगे मैं यूँ घबरा जाती हूँ 
जैसे शहर मैं घबरा जाये देहाती 

मेरी वफ़ाएं अब भी हरी भरी सी हैं 
सूख गयी है घास की जो थी बरसाती 

जीवन भर रोयेगी मुफ़लिस की बेटी 
घर तक आकर लौट गए हैं बाराती 

आस की हांडी  तोड़ दी माँ ने तंग आकर 
झूठ से कब तक भूखे बच्चे बहलाती 

मुल्कों मुल्कों चोंच पसारे फिरती है 
सोने की चिड़िया भी बन गयी ख़ैराती 

हमने उनको बाँट दिया है खानों में 
सोनी सब इंसानों की है इक जाती  ग़ज़ल 

ग़ज़ल - जिस्म के ये व्योपारी कब सहारा देते हैं

जिस्म के ये व्योपारी कब सहारा देते हैं 
पहले माँग भरते हैं फिर गुज़ारा  देते  हैं 

ये हमारे आँसू भी कम नहीं चरागों से
जब चराग़ बुझते हैं ये सहारा देते हैं 

पुरसुकून शहरों  में आग ख़ुद नहीं लगती 
सरफिरी हवाओँ को वो इशारा देते हैं 

उनकी राजनीती का कुछ पता नहीं चलता 
कब शरारा देते हैं कब सितारा देते हैं 

इन सियासी लोगों की फ़ितरतों में शामिल है 
पहले घर जलाते हैं फिर सहारा देते हैं 

हमने छोड़ रक्खा है फैसला बुज़ुर्गों पर 
देखिये हमें किस दिन हक़ हमारा देते हैं 

ग़ज़ल

हर तरफ भीड़ है और भीड़ का छटना  मुश्किल 
भीड़ में रह के तेरे नाम को रटना  मुश्किल 

दर्द की रात  के दामन पे है अश्कों का हुजूम 
दर्द की रात  के दामन का सिमटना मुश्किल 

प्यार के लफ्ज़ में  इक़रारे  वफ़ा होता है 
हर किसी के लिए इस लफ्ज़ का रटना मुश्किल 

एक हो जाएँ अगर भूख के मारे इन्सां 
 फिर तो  इन फ़सलों का धनवानों में बटना मुश्किल 

बदगुमानी की किसी शख़्स के दिल पर सोनी 
धुंध छा जाये तो फिर धुंध का छटना मुश्किल 


Thursday, October 11, 2018

गीत - मंदिर की मूर्ति पे नहीं उठती उँगलियाँ

मंदिर की मूर्ति  ने हाले  दिल बता दिया 
दुनिया ने किस तरह मुझे देवी बना दिया 

रूँधा था सबने पांव में, पत्थर थी राह में
इक दिन उठाया सबने, पूजने की चाह में 
एक ख़्वाब  मेरे वास्ते सबने सजा दिया....दुनिया ने किस तरह

पत्थर का दिल लिए वो आया मेरा मूर्तिकार  
छेनी हथोड़े ले लिए देने लगा संस्कार  
लाख चोट देके दर्द को सहना सिखा दिया..... दुनिया ने किस तरह 

धीरे धीरे रूप आने लगा, नूर छा गया  
अब चोट सहने का सलीक़ा मुझको आ गया  
दर्द पी के मुस्कुराना भी उसने सीखा दिया... दुनिया ने किस तरह

लाख चोट खा के दिल हुआ था दर्दे समंदर 
ऊपर से देखने में मगर थी बहुत  मैं सुन्दर 
मंदिर में एक दिन मुझे सबने बिठा दिया....दुनिया ने किस तरह 

मैं पूछती हूँ आपसे क्यूँ  पूजने से पहले 
संसार का नियम क्यूँ ज़रूरी है घाव सहने 
प्रतिमा का ये दुःख सबको दिखाई नहीं दिया ... दुनिया ने किस तरह

मंदिर की मूर्ति पे नहीं उठती उँगलियाँ
पत्थर से मूर्ति  बनी जानी सच्चाइयाँ ​
वरदान बन के पीड़ा ने सब कुछ भुला दिया... दुनिया ने किस तरह

है नारियों से कहना तुमको पड़े जो  सहना 
प्रतिमा की तरह तुम भी कभी लक्ष्य से न हटना 
 प्रतिमा ने नारियों को यूँ जीना सिखा दिया  ... दुनिया ने किस तरह

Wednesday, October 3, 2018

उनकी नज़र से शर्म की दीवार गिर गयी 
बस एक वोट से मेरी सरकार गिर गयी 

कश्ती पहुँच रही थी किनारे के आस पास 
ऐसे में मेरे हाथ से पतवार गिर गयी 

रख देती है जला के जो हर एक शाख को 
बिजली मेरे चमन पे वो सौ बार गिर गयी 

इस बार मेरे घर में भी सैलाब  आ गया
इस बार मेरे घर  की भी  दीवार गिर गयी 

करता था नाज़ जिसपे वो मैदाने जंग में 
कातिल के हाथ से वो ही तलवार गिर गयी 

सोनी हमारी  चाल  को ऐसी नज़र लगी 
पाज़ेब पांव से सरे बाजार गिर गयी 

डॉ अनीता सोनी 
अंतर्राष्ट्रीय कवियत्री एवं शायरा 
  एमए पीएचडी {हिंदी साहित्य}



Sunday, September 23, 2018

डॉ अनीता सोनी
एम. ए. पीएचडी  हिंदी साहित्य
(अंतर्राष्ट्रीय कवियत्री एवं शायरा )

ग़ज़ल 

तुम्हारी याद को अश्कों में ढाल  बैठी हूँ 
दहकते शोले को पानी में डाल बैठी हूँ 

मैं अपने जिस्म पे ज़ख्मों की ओढ़ कर चादर 
तुम्हारे ज़ुल्म  की ज़िंदा मिसाल बैठी हूँ 

ये छाले चेहरे पे यूँ ही नहीं पड़े मेरे 
किसी के हिज़्र में आँसू  उबाल बैठी हूँ 

न टाल मुझको मेरे चारागर ख़ुदा के लिए 
मैं ज़िंदगानी का लेकर सवाल बैठी हूँ 

हरीफ़े अम्न न पथराव कर दे ए  सोनी 
मैं खेल खेल में पत्थर उछाल बैठी हूँ  


Wednesday, September 12, 2018

ग़ज़ल

ए  मेरे मालिक कलम से इल्तिजा लिखती हूँ मैं
ए नए फूलों तुम्हे दिल से दुआ लिखती हूँ मैं
देखती हूँ जब ज़मीं पर कोई आफ़त  आएगी
दुश्मनों के दर पे भी अपना पता लिखती हूँ मैं
बस गयी है जब से मेरे दिल में सूरत आपकी
उस घडी से अपने दिल को आइना लिखती हूँ मैं
मोतियों से तोलती हूँ अपने हर इक  शेर को
आँसुओं से ज़िन्दगी का माज़रा लिखती हूँ मैं
 ख़ून आँखों से छलक पड़ता है अपने आप ही
जब किसी काग़ज़ पर अपना तजुर्बा लिखती हूँ मै
थोड़ा रोने से उतर जाता है मन का बोझ भी
इसलिए तो अपनी आँखों को घटा लिखती हूँ मैं
कैसे अपने आप आ जाती है लफ़्ज़ों में मिठास
सोनी ज़हरे इश्क़ का जब ज़ायक़ा लिखती हूँ मैं


मेरी ग़ज़ल मेरा आइना।  मैं भी दुआ करूँ आप भी दुआ करें। 

ग़ज़ल

जो सोचा है वही पुरकैफ़ मंज़र बन के रह जाये
मेरी ख़्वाहिश है वो मेरा मुक़द्दर बन के रह जाये

मज़ा जब है के तेरे  हिज़्र में मेरा हरेक आँसू
निकलकर आँख से पलकों  पे गौहर बन के रह जाये

मैं जिसको पूजती रहती हूँ अपने दिल के मंदिर में
वो मनमोहन कहीं मेरा ना पत्थर बन के रह जाये

दुआ करती हूँ रोजो शब ऐ  मेरी  जान  के मालिक
जिसे कहते हैं घर ऐसा मेरा घर बन के रह  जाये

जिसे जूड़े में  मैं अपने सजा लूँ ऐ मेरे मालिक
तमन्ना है वो इक ऐसा गुलेतर बन के रह जाये



ये और बात के आँसू  बहा बहा के जिए
चिराग़ याद के तेरी मगर जला के जिए

हम अपने बाद की नस्लों को याद आएँगे
हम अपने कांधों पे अपनी सलीब उठा के जिए

उदासियों ने तो अब आके हमको घेरा है
बहुत दिनों तो यहाँ हम भी मुस्कुरा के जिए

तमाम शहर में हैं नफ़रतों के अँधियारे
मगर ख़ुलूस की हम मशअलें जला के जिए

दिखाई देने लगे अक्स संगबारों के
हम अपने आप को यूँ आइना बना के जिए

अजीब लोग थे सोनी जो क़द की हसरत में
तमाम उम्र ही बैसाखियाँ लगा के जिए



ग़ज़ल

जितनी नज़दीक उसके गयी ज़िन्दगी
उतनी ही दूर उससे हुई  ज़िन्दगी

कोई बादल न गुज़रा बरसता हुआ
एक सूखी नदी ही रही ज़िन्दगी

मैं तो आवाज़ देकर जगाती रही
मौत सी नींद  सोती रही ज़िन्दगी

साक़िए मयक़दा मयकशी के लिए
कम मिली कम मिली कम मिली ज़िन्दगी

पास आकर कभी और कभी दूर से
मुझको आवाज़ देती रही ज़िन्दगी

चाँद  तारों से सोनी शबे हिज़्र में
मांगती  ही रही  रौशनी ज़िन्दगी

"चाँद पागल  गया " मेरे पहले ग़ज़ल संग्रह  से है मेरी ज़िन्दगी का  ये एक छोटा सा आइना। अगर आप देखेंगे तो शायद ये आपको अपना आइना लगे. बहुत बहुत शुक्रिया.



Tuesday, September 11, 2018

जाते जाते छोड़ गए तुम आँखों में बरसात
पिया जी भीगूँ मैं दिन रात ...... पियाजी

अंसुवन से ये भीगा मौसम मन में आग लगाए
मन तुम्हारे दर्शन को तड़पे कौन इसे समझाए
इस ज़िद्दी बालक ने दे दी साजन मुझको मात ...... पियाजी भीगूँ  मैं .......

मेरे मुख पर झूलती लट  को वो तुम्हरा सुलझाना
बागीचे में देख अकेले बारम्बार सताना
रह रह कर अब याद आती हैं तुम्हारी हर इक बात ......पियाजी  भीगूँ  मैं......

साँझ ढले ही खुल जाते हैं यादों के सब द्वारे
ठंडी हवाएं भर देती हैं नस नस में अंगारे
होते हैं महसूस बदन पर तुम्हरे चंचल हाथ ..... पियाजी भीगूँ मैं.......

पायल की छन छन भी चुप है चूड़ी भी न खनके
कैसे नाचे कान  के बाले कैसे बिंदिया चमके
मांग रहे हैं ज़ेवर गहने फिर से तुम्हारा साथ ...... पियाजी भीगूँ  मैं.......

बस्ती भर में बन गयी मेरे मन की पीर कहानी
तुम मेरे मधुबन के कान्हा मैं तुम्हारी दीवानी
जपती हूँ मैं नाम तुम्हारा भूल गयी हर बात पियाजी। ..... भीगूँ  मैं..... 

Monday, September 10, 2018

ए चराग़े वफ़ा क्या करूँ क्या करूँ
चल रही है हवा क्या करूँ क्या करूँ

मिल न पायी कहीं पर मुझे आज तक
ज़ख्मे दिल की दवा क्या करूँ क्या करूँ

दर्दे फुरक़त मेरी रूह तक आ गया
ए मसीहा बता क्या करूँ क्या करूँ

आ गया आँख  से आज दामन तलक
अश्क़ का सिलसिला क्या करूँ क्या करूँ

आज सांसें मेरी मुझसे करने लगी
ज़िन्दगी का गिला क्या करूँ क्या करूँ

अश्क़ रुकते नहीं आह थमती नहीं
ए  ग़मे दिल बता क्या करूँ क्या करूँ

Tuesday, August 21, 2018

ग़ज़ल

सोचती हूँ झुकाकर नज़र देख लूँ
कितने गहरे हैं ज़ख़्मे जिगर देख लूँ

लाख हिम्मत नहीं है मगर देख लूँ
उसके चेहरे को मैं एक नज़र देख लूँ

हो इजाज़त तो मैं आपकी आँख में
अपनी तस्वीर को एक नज़र देख लूँ

मेरी पलकों पे किरनें  चमकने लगें
बंद आँखों से उसको अगर देख लूँ

इससे पहले के सोनी वो मुझसे मिलें
एहतियातन इधर और उधर देख लूँ


Monday, August 13, 2018

भरे घर का भी आँगन काटता है
न हो साजन तो दर्पण काटता है

फुआरें आग बरसाती हैं तन पर
अकेलेपन में सावन काटता है

तुम्हारी याद  में जलती है बिंदिया
कलाई को ये कंगन काटता है

वो बच्चा जल्द हो जाता है बूढा
ग़रीबी में  जो बचपन काटता है

कन्हाई की अगर बंसी न बाजे
तो फिर कान्हा को मधुबन काटता है

बसी है इस जगह पुरखों की यादें
पुराने घर का आँगन काटता है

सुकूने  दिल अगर खो जाये सोनी
तो धन वालों को भी धन काटता है

Wednesday, August 8, 2018

ये है खाना खज़ाना कार्यक्रम कविता का,
आज बनेगा हमारी मन की रसोई में एक मसालेदार गीत
सामग्री के लिए काव्यकला  के डब्बे डिबिया निकालिये और लीजिये
 एक  चाँद एक चांदनी, कुछ राग कुछ रागिनी
थोड़ी सी जवानी वो भी दीवानी
एक उम्र ज़रा सी कच्ची पर प्रीत बिलकुल सच्ची
तेज़ धड़कन धीमी सी आस एक पारो एक देवदास
 बरसते दो नयन एक गगन, एक समाज अपने में मगन
एक कली और कुछ फूल, एक भंवरा और बाकी  शूल
थोड़ी सी नींद बहुत सारे सपने, दुनिया भर के दुश्मन दो चार अपने
छोटा सा दिन लम्बी सी रात, पुकारती कोयल और पपीहे की बात
थोड़ी सी बेवफ़ाई और ताज़ा बहाना
पल भर की रूठन और घड़ी भर का मनाना
 अम्बुआ की डाल  सावन के झूले ज़ुल्फ़ों की छाँव में रास्ता जो भूले
छनकती चूड़ियां झनकती पायल,  एक  बीमार एक घायल
थोड़ी सी हंसी बेहिसाब रोना, पाना काम ज़्यादा खोना
झूठ मूठ की झड़प और और सचमुच की तड़प
ढेर सारे आंसू ठंडी सी आह, कोमल क़दम काँटों की राह
कुछ भूली बिसरी बातें कुछ खट्टी  मीठी याद
  इक लैला मजनूं और  इक शीरी फ़रहाद
प्यार की दुश्मन ये  ही दुनिया और अपनों के सवाल
मुझ जैसी इक "सोनी" हो और इक तुझसा महवाल
इक उफ़नाती नदिया और एक हो कच्चा घड़ा
प्यार की खातिर  मर जाने का जज़्बा सबसे बड़ा
पल भर का  मिलन और जीवन  भर  की जुदाई
         एक हो  ईश्वर या हो एक ख़ुदाई
बस इतनी ही चीज़ें पड़ती हैं गीत में
इन्हें कल्पना के किचन में सजाइये
काग़ज़  की कड़ाही में  ग़मों का घी डालकर अरमानों की आग में तपाइये
जब धुँआ दिल से  उठने लगे तो एक एक कर सारे मसाले छौंक दीजिये.
कलम की कलछी से ख़ूब मिलाइये,  बना के कहीं भूल न जाइये ,
 अच्छे शीर्षक से सजा के, दो दो  चार चार की लाइनों में परोसिये
लीजिये गरमा गरम लाजवाब गीत तैयार है।
यहीं  खाएंगे या घर ले जायेंगे




Friday, August 3, 2018

तुम एक मौसम ही तो थे (कविता)

तुम्हारे आते ही मुरझाये फूल खिल उठते थे
तन में सोया मन जाग  जाता था
मन की बगिया में सुरभित बयार अटखेलियां करने लगती थीं
तन मन में उमंग की रंगोलियां सजने लगती थीं
और मैं समझती थी कि बसंत की बहार आ गयी
तुम्हारे ज़रा से स्पर्श से वर्षों की जमी बर्फ
 पल भर में पिघलने लगती थी
रात  रानी भी  दिन में ही महक जाती थी
मन के प्यासे काले बादल अपनी ही  खायी
कसम तोड़ कर खुद पर ही बरसने लगते थे
और मैं समझती थी की सुहानी वर्षा ऋतु आ गयी
तुम्हारे ज़रा से नाराज़ होते ही तन मन रेगिस्तान हो उठता था
गर्म हवाएँ सायं सायं की ध्वनि से
उजड़े जीवन का करुण संगीत सुनाने लगती थीं
मन जलता हुआ अंगार और तन उसपर रखी
 गर्म खाली हांड़ी की तरह तड़क उठता था
और मैं समझती थी की यही भीषण ग्रीष्म ऋतु है महा दुर्भिक्ष है
इसी तरह तुम्हारी दी हुई ऋतुओं से
 मेरी उम्र गुज़रती रही और तुमने गुज़रने दी
कितने सावन बीते कितने बसंत रंगहीन हुए
कितने बदल बरसे कितनी आग बरसी पता ही नहीं चला
 मैं भीगती सूखती रही मैं गुलाल उड़ाती रही मैं रस बरसाती रही
 मैं तड़पती भी  रही मैं उजड़ती ही रही
तुम्हारे सावन थे तुम्हारी  बसंत थी
 तुम्ही आग थे तुम्ही बादलों की बारिश भी और मैं धरती
जब तक तुमने चाहा ऋतुओं का आना जाना चलता  रहा
और मैं सब समझते हुए भी  इसे अपने  प्रति  तुम्हारा अपना प्रेम समझती रही
मगर तुम सदा के लिए कभी  मेरे नहीं हुए
तुम तो सिर्फ एक  मौसम थे और एक  मौसम ही रहे।
 बार बार आते रहे जाने के लिए
 हर  बार, न जाने कितनी बार
तुम एक मौसम ही तो थे





Tuesday, July 31, 2018

दहेज़ गीत

साड़ी पहनूँ उसकी ख़ातिर या कुरता सलवार
घर आएगा देखने कोई मुझको पहली बार

घर बैठे बिकने आते हैं पढ़े लिखे ये बकरे
तीस मारखां जैसे तनकर  खूब दिखाएँ नख़रे
हम जब मोल चुकाएंगे बत्तीसी गिनकर देखेंगे
दम ख़म है के नहीं ज़रा सा ठोक बजा कर देखेंगें
घोड़ों के संग रेस लगाकर ट्रायल दो  एक बार ---साड़ी

बेटा बेच के माँ ने अपने दूध का कर्ज़ा पाया है
अपने ख़ून की कर के दलाली बाप ने माल कमाया है
बाज़ारू औरत कहते हैं तन जो बेचा करती है
इन दूल्हों को क्या कहते हैं  जिनकी बोली लगती है
अब तो पुरषों के भी लगते हैं मीना बाज़ार

घर गाड़ी पैसे और गहने बेशर्मी से मत मांगो
दान दहेज़ की आरी से बेटी के बाप को मत काटो
पढ़ लिखकर काबिल बनकर क्यूँ अपना मोल लगाते हो
लड़की वालों के आगे माँ बाप से भीख मंगाते हो
शर्म करो अब ख़त्म करो ये  भिखमंगों की क़तार



ग़ज़ल

आह और वाह  का तमाशा है
और सिवा इसके ज़िन्दगी क्या है

वो जो परदे के पीछे रहता है
वो ही क़ातिल है वो ही मसीहा है

पेशे ख़िदमत है जानो दिल साहिब
और किस चीज़ की तमन्ना है

ए  ख़ुदा खैर हो मेरे ख़त की
ग़ैर के हाथ में लिफ़ाफ़ा

मुझको बेनाम कर दिया आख़िर
और दुनिया का क्या इरादा है

सोनी उस नामुराद के दिल में
अब भी जीने की तमन्ना है 

Thursday, July 26, 2018

क़ुदरत के इन हसीन नज़ारों को चूम लूँ

ग़ज़ल

क़ुदरत के इन हसीन नज़ारों  को चूम लूँ
जी चाहता है चाँद सितारों को चूम लूँ

काग़ज़  की एक छोटी सी कश्ती में बैठ कर
बहती हुई नदी के किनारों को चूम लूँ

काली घटा की ओढ़नी सूरज पे डाल कर
सावन की सब्ज़ सब्ज़ बहारों को चूम लूँ

फूलों की अंजुमन में जो जाना नसीब हो
तितली की तरह मैं भी बहारों  को चूम लूँ

सोनी हवा के डोले पे होकर सवार मैं
बारिश की हल्की हल्की फुहारों को चूम लूँ