Wednesday, May 29, 2019

ग़ज़ल

ये हवा क्या करे वो घटा क्या करे
घाव नभ ने दिए हैं धरा क्या करे
भूख और प्यास जिस का मुक़द्दर हुए
आबोदाने का फिर वो गिला क्या करे
जब मुसाफ़िर ही कश्ती डुबोने लगे
ऐसी मुश्किल में वो नाख़ुदा क्या करे
पेड़ ने झूमने की अदा छोड़ दी
प्यार के गीत गाकर हवा क्या करे
सोनी रिश्तों में दीवार उठ जाए तो
घर के आंगन का बूढ़ा दिया क्या करे

Saturday, May 25, 2019

ग़ज़ल

अंदाज़ ज़िन्दगी का बदलने से क्या मिला
ए दोस्त तेरे पहलू में ढलने से क्या मिला
मिट्टी के वो शरीर तो मिट्टी को पा गए
चन्दन को उन चिताओं में जलने से क्या मिला
सायों में भी वो धूप का माहौल ही रहा
छाओं में हमको पेड़ की चलने से क्या मिला
पत्थर मिसाल शख़्स था पत्थर का ही रहा
कल रात हमको उसके पिघलने से क्या मिला
आवारगी से पांव के छालों ने पूछा है
घर छोड़ कर सड़क पे निकलने से क्या मिला
ए इंतज़ारे वस्ल मिरी सुब्ह को बता
कमरे में रातभर यूं टहलने से क्या मिला

Saturday, May 11, 2019

ग़ज़ल

सुबह की गोदड़ी में छुपाए रखे
रात के ख़्वाब दिन में सजाए रखे
रंजो ग़म दर्दे दिल और आहों फ़ुग़ाँ
बोझ हमने भी कितने उठाए रखे
रिश्ते नाते सभी दे रहे थे धुआं
उन चराग़ों को फिर भी जलाये रखे
कौन थे जिनको दुःख बांटते हम भला
दोस्त जो  भी थे वो सब भुलाये रखे
बारिशे अश्क़  से मिट  न जाये कहीं
वो जो काग़ज़ पे चेहरे बनाये रखे
काम आते हैं सोनी बुरे वक्त में
इसलिए खोटे सिक्के बचाये रखे