Saturday, May 2, 2015

मनहरण घनाछरी छंद

कहत सुनत नहीं, लगत अनत नहीं,लगन लगी है ऐसी, मन घनश्याम की।
मन मदन मोहन, रंगरसिया सजन,बखानी न जाये छवि, ललित ललाम की।
छलक छलक अंग, यौवन कलश रस,काम की कमान बिन," सोनी" किस काम की।
बजे बांसुरी की तान, गूंजे गोपियों के गान, अनुपम अलोकिक, छवि ब्रजधाम की।    

4 comments:

Anonymous said...

Beautiful lyrics and rhythm. Great for singing. Congratulations!

Anita Soni - Kaviyatri, Shayara said...
This comment has been removed by the author.
Anita Soni - Kaviyatri, Shayara said...

thanks so much for your words.
may i know your good name please.

diepou said...

कैसे बाँवरि थी, वो ग़ोपाळ गिरधारी की. कितने ऩाम रक्ख छोड़ो इस प्यासी ने,
कऊँ नाम से पुकारोँ बॄज्ज़ लाला, ब्रिज्ज़ लाल, या बिरज नंदन ये दासी तुम्हारी,
बांके बिहारी है तेरो बसी मूरत, मेरो मन् मंदिर में बना दिया इक गोपी मौकों ......