Monday, August 13, 2018

भरे घर का भी आँगन काटता है
न हो साजन तो दर्पण काटता है

फुआरें आग बरसाती हैं तन पर
अकेलेपन में सावन काटता है

तुम्हारी याद  में जलती है बिंदिया
कलाई को ये कंगन काटता है

वो बच्चा जल्द हो जाता है बूढा
ग़रीबी में  जो बचपन काटता है

कन्हाई की अगर बंसी न बाजे
तो फिर कान्हा को मधुबन काटता है

बसी है इस जगह पुरखों की यादें
पुराने घर का आँगन काटता है

सुकूने  दिल अगर खो जाये सोनी
तो धन वालों को भी धन काटता है

Wednesday, August 8, 2018

ये है खाना खज़ाना कार्यक्रम कविता का,
आज बनेगा हमारी मन की रसोई में एक मसालेदार गीत
सामग्री के लिए काव्यकला  के डब्बे डिबिया निकालिये और लीजिये
 एक  चाँद एक चांदनी, कुछ राग कुछ रागिनी
थोड़ी सी जवानी वो भी दीवानी
एक उम्र ज़रा सी कच्ची पर प्रीत बिलकुल सच्ची
तेज़ धड़कन धीमी सी आस एक पारो एक देवदास
 बरसते दो नयन एक गगन, एक समाज अपने में मगन
एक कली और कुछ फूल, एक भंवरा और बाकी  शूल
थोड़ी सी नींद बहुत सारे सपने, दुनिया भर के दुश्मन दो चार अपने
छोटा सा दिन लम्बी सी रात, पुकारती कोयल और पपीहे की बात
थोड़ी सी बेवफ़ाई और ताज़ा बहाना
पल भर की रूठन और घड़ी भर का मनाना
 अम्बुआ की डाल  सावन के झूले ज़ुल्फ़ों की छाँव में रास्ता जो भूले
छनकती चूड़ियां झनकती पायल,  एक  बीमार एक घायल
थोड़ी सी हंसी बेहिसाब रोना, पाना काम ज़्यादा खोना
झूठ मूठ की झड़प और और सचमुच की तड़प
ढेर सारे आंसू ठंडी सी आह, कोमल क़दम काँटों की राह
कुछ भूली बिसरी बातें कुछ खट्टी  मीठी याद
  इक लैला मजनूं और  इक शीरी फ़रहाद
प्यार की दुश्मन ये  ही दुनिया और अपनों के सवाल
मुझ जैसी इक "सोनी" हो और इक तुझसा महवाल
इक उफ़नाती नदिया और एक हो कच्चा घड़ा
प्यार की खातिर  मर जाने का जज़्बा सबसे बड़ा
पल भर का  मिलन और जीवन  भर  की जुदाई
         एक हो  ईश्वर या हो एक ख़ुदाई
बस इतनी ही चीज़ें पड़ती हैं गीत में
इन्हें कल्पना के किचन में सजाइये
काग़ज़  की कड़ाही में  ग़मों का घी डालकर अरमानों की आग में तपाइये
जब धुँआ दिल से  उठने लगे तो एक एक कर सारे मसाले छौंक दीजिये.
कलम की कलछी से ख़ूब मिलाइये,  बना के कहीं भूल न जाइये ,
 अच्छे शीर्षक से सजा के, दो दो  चार चार की लाइनों में परोसिये
लीजिये गरमा गरम लाजवाब गीत तैयार है।
यहीं  खाएंगे या घर ले जायेंगे




Friday, August 3, 2018

तुम एक मौसम ही तो थे (कविता)

तुम्हारे आते ही मुरझाये फूल खिल उठते थे
तन में सोया मन जाग  जाता था
मन की बगिया में सुरभित बयार अटखेलियां करने लगती थीं
तन मन में उमंग की रंगोलियां सजने लगती थीं
और मैं समझती थी कि बसंत की बहार आ गयी
तुम्हारे ज़रा से स्पर्श से वर्षों की जमी बर्फ
 पल भर में पिघलने लगती थी
रात  रानी भी  दिन में ही महक जाती थी
मन के प्यासे काले बादल अपनी ही  खायी
कसम तोड़ कर खुद पर ही बरसने लगते थे
और मैं समझती थी की सुहानी वर्षा ऋतु आ गयी
तुम्हारे ज़रा से नाराज़ होते ही तन मन रेगिस्तान हो उठता था
गर्म हवाएँ सायं सायं की ध्वनि से
उजड़े जीवन का करुण संगीत सुनाने लगती थीं
मन जलता हुआ अंगार और तन उसपर रखी
 गर्म खाली हांड़ी की तरह तड़क उठता था
और मैं समझती थी की यही भीषण ग्रीष्म ऋतु है महा दुर्भिक्ष है
इसी तरह तुम्हारी दी हुई ऋतुओं से
 मेरी उम्र गुज़रती रही और तुमने गुज़रने दी
कितने सावन बीते कितने बसंत रंगहीन हुए
कितने बदल बरसे कितनी आग बरसी पता ही नहीं चला
 मैं भीगती सूखती रही मैं गुलाल उड़ाती रही मैं रस बरसाती रही
 मैं तड़पती भी  रही मैं उजड़ती ही रही
तुम्हारे सावन थे तुम्हारी  बसंत थी
 तुम्ही आग थे तुम्ही बादलों की बारिश भी और मैं धरती
जब तक तुमने चाहा ऋतुओं का आना जाना चलता  रहा
और मैं सब समझते हुए भी  इसे अपने  प्रति  तुम्हारा अपना प्रेम समझती रही
मगर तुम सदा के लिए कभी  मेरे नहीं हुए
तुम तो सिर्फ एक  मौसम थे और एक  मौसम ही रहे।
 बार बार आते रहे जाने के लिए
 हर  बार, न जाने कितनी बार
तुम एक मौसम ही तो थे





Tuesday, July 31, 2018

दहेज़ गीत

साड़ी पहनूँ उसकी ख़ातिर या कुरता सलवार
घर आएगा देखने कोई मुझको पहली बार

घर बैठे बिकने आते हैं पढ़े लिखे ये बकरे
तीस मारखां जैसे तनकर  खूब दिखाएँ नख़रे
हम जब मोल चुकाएंगे बत्तीसी गिनकर देखेंगे
दम ख़म है के नहीं ज़रा सा ठोक बजा कर देखेंगें
घोड़ों के संग रेस लगाकर ट्रायल दो  एक बार ---साड़ी

बेटा बेच के माँ ने अपने दूध का कर्ज़ा पाया है
अपने ख़ून की कर के दलाली बाप ने माल कमाया है
बाज़ारू औरत कहते हैं तन जो बेचा करती है
इन दूल्हों को क्या कहते हैं  जिनकी बोली लगती है
अब तो पुरषों के भी लगते हैं मीना बाज़ार

घर गाड़ी पैसे और गहने बेशर्मी से मत मांगो
दान दहेज़ की आरी से बेटी के बाप को मत काटो
पढ़ लिखकर काबिल बनकर क्यूँ अपना मोल लगाते हो
लड़की वालों के आगे माँ बाप से भीख मंगाते हो
शर्म करो अब ख़त्म करो ये  भिखमंगों की क़तार



ग़ज़ल

आह और वाह  का तमाशा है
और सिवा इसके ज़िन्दगी क्या है

वो जो परदे के पीछे रहता है
वो ही क़ातिल है वो ही मसीहा है

पेशे ख़िदमत है जानो दिल साहिब
और किस चीज़ की तमन्ना है

ए  ख़ुदा खैर हो मेरे ख़त की
ग़ैर के हाथ में लिफ़ाफ़ा

मुझको बेनाम कर दिया आख़िर
और दुनिया का क्या इरादा है

सोनी उस नामुराद के दिल में
अब भी जीने की तमन्ना है 

Thursday, July 26, 2018

क़ुदरत के इन हसीन नज़ारों को चूम लूँ

ग़ज़ल

क़ुदरत के इन हसीन नज़ारों  को चूम लूँ
जी चाहता है चाँद सितारों को चूम लूँ

काग़ज़  की एक छोटी सी कश्ती में बैठ कर
बहती हुई नदी के किनारों को चूम लूँ

काली घटा की ओढ़नी सूरज पे डाल कर
सावन की सब्ज़ सब्ज़ बहारों को चूम लूँ

फूलों की अंजुमन में जो जाना नसीब हो
तितली की तरह मैं भी बहारों  को चूम लूँ

सोनी हवा के डोले पे होकर सवार मैं
बारिश की हल्की हल्की फुहारों को चूम लूँ 

Tuesday, March 8, 2016

है राम जो अबके आना सीता को दुःख मत देना 
क़सम  तुम्हे रामायण की सातों ही जनम निभा लेना।  है राम

नारी के बिन नारायण कैसे कहला पाओगे 
कितने जन्मों तक सोने की सीता बनवाओगे 
बिन नारी जीवन, घर सूना, कैसे जगत चलाओगे। है राम 

पत्थर को नारी  करने वाले पत्थर बन बैठे 
नैन मूँद कर ले लिए भगवन मर्यादा के ठेके 
अपने ही अंतर्मन को आखिर कब तक ठुकराओगे।  है राम 

तुमने नारी को ये कैसी प्रीत की शिक्षा दी है 
नारी ने ही दुनिया में क्यों अग्नि परीक्षा दी है 
ओ दुनिया के पुरुषों कब तक नारी चिता सजाओगे।  है राम 





Saturday, May 2, 2015

चाँद पागल हो गया { ग़ज़ल }

बेख़बर सोती रही तो चाँद पागल हो गया
इस तरह की दिल्लगी तो चाँद पागल हो गया

रौशनी मेरे बदन की रात के पिछले पहर
चांदनी सी खिल गयी तो चाँद पागल हो गया

रात भर आकाश पर काली घटा छाती रही
जब हवा ठंडी चली तो चाँद पागल हो गया

रात की रानी सी ख़ुशबू  शाम के ढलने के बाद
मेरी ज़ुल्फ़ों से उड़ी तो चाँद पागल हो गया

रूठ कर बादल चले हैं रूठ कर तारे चले
रूठ कर बदली चली तो चाँद पागल हो गया

रात की तन्हाइयों की बात सोनी सुब्ह दम
शोख़ लहजे में कही तो चाँद पागल हो गया 

मनहरण घनाछरी छंद

कहत सुनत नहीं, लगत अनत नहीं,लगन लगी है ऐसी, मन घनश्याम की।
मन मदन मोहन, रंगरसिया सजन,बखानी न जाये छवि, ललित ललाम की।
छलक छलक अंग, यौवन कलश रस,काम की कमान बिन," सोनी" किस काम की।
बजे बांसुरी की तान, गूंजे गोपियों के गान, अनुपम अलोकिक, छवि ब्रजधाम की।    

प्रेम की मथुरा

मेरे जीवन के पतझड़ में तेरा मुखड़ा तो सावन है
कभी तू राम है मेरा  कभी छलिया मनभावन है 
बसो मन मीत  बनकर गीत मेरे मन के  मंदिर में 
मेरा मन प्रेम की मथुरा और अधरों पे  वृंदावन  है 

याद में उसकी पागल है

बहे जो आँख से आँसू मुहब्बत में गंगाजल है
तड़पता है ये दिल मेरा याद में उसकी पागल है
बहुत है धूप, मंज़िल दूर, तन्हा राह उल्फ़त  की
मेरी क़िस्मत में क्या कोई प्यार का प्यासा बादल है





गीत

अपनी ज़मीन पर आँसू बहुत हैं ख़ुशियाँ हैं कम
ख़ुशियाँ बाँट लें आजा भुला दें दुनियाँ  के ग़म  

घिर आये रे दुक्ख के मौसम
हुआ जाता है मौसम ये बोझल
मुस्काने सारी धोने से पहले
आ जाओ हम ख़ुशियाँ बाँट लें। आजा भुला दें ....

हो चलो चलकर मुहब्बत बचाएं
वक़्त है आदमियत बचाएं
इंसानियत की ये इल्तज़ा है
मिल जुल के हम ख़ुशियाँ बाँट लें।  आजा भुला दें …

हम तो पंछी हैं इक आसमाँ  के
दो ये आवाज़ सारे जहाँ से
कहते हैं हम से  दुनियाँ के सारे
 दीनो धरम ख़ुशियाँ बाँट लें। आजा भुला दें …

अब के यूँ आये जीने का मौसम
सबको मिल जाये जीने का मौसम
सपनों की जन्नत बन के हक़ीक़त
चूमें क़दम ख़ुशियाँ बाँट लें।  आजा भुला दें …

कोई उजड़े घरों को न रोये
कोई अपने चहेते न खोये
अब दिन  न आये आँखें किसी की
करने का नम ख़ुशियाँ बाँट लें।  आजा भुला दें …

अपनी जन्नत को जलने न देंगे
दिन को शब में बदलने न देंगे
तुझको अँधेरे डसने खड़े हैं
थम यार थम खुशियां बाँट लें।  आजा भुला दें …


Thursday, December 22, 2011

प्रणय का दीप

पिया ने प्रीत की पायल मुझे कुछ ऐसी पहनाई
प्रणय का दीप देहरी पर सजाने मैं चली आई

ये बादल ज़ुल्फ़ मेरी देख मुंह अपना छुपाता है
की सूरज मांग भरने लालिमा लेकर के आता है
चाँद भी देखकर मुझको सदा नज़रें चुराता है
आसमां मेरे कदमों में सितारों को बिछाता है
मुझसे पूछ कर चलती है पिछवा और पुरवाई
प्रणय का दीप ........

मैं सागर से मिलूंगी मिल के सागर को खंगालूंगी
सीप के गर्भ से गर्वीले मोती को निकालूंगी
मैं राही प्रेम पथ की हूँ प्रबल संवेदना की हूँ
मुझे मत रोकना सरिता उमड़ती भावना की हूँ
मिलन की रागिनी मैंने पिया के अधरों से गाई
प्रणय का दीप .........

मैं तेरी ही कविता हूँ मैं तेरी ही समीक्ष! हूं
देह के व्याकरण में प्रेम के छंदों की शीक्ष! हूं.
मैं तेरा प्रश्न भी उत्तर भी हूं तेरी परिक्ष! हूं
अहिल्या ने जो की थी राम की मैं वो प्रतिक्ष! हूं
छुअन के वास्ते प्रियतम युगों से मैं हूं पथराई
प्रणय का दीप ......
( maf kijiyega is geet ke aakhri band me ek akchhar me mujhe aa ki matra lagana nahi aayi. aap khud samjhj gaye honge .dhanyavad)

Monday, February 16, 2009

चांद जल जाए ग़ज़ल

इक ज़रा धूप जो निकल जाए
बर्फ़ ग़म की अभी पिघल जाए

ऐसा चेहरा है मेरी आंखों में
चांद देखे तो चांद जल जाए

एक कांटा जो दिल के अंदर है
दिल से निकले तो दम निकल जाए

उसको ठोकर सलाम करती है
बाद गिरने के जो सम्भल जाए

ज़ख्मे दिल वो चराग़ हैं सोनी
शाम से पहले ही जो जल जाए

Wednesday, December 31, 2008

नया साल मंगलमय हो

हाथ जब मिलाना हो दिल भी साथ रख लेना
दिल अगर नहीं मिलते दोस्ती अधूरी है
नये साल में आप सभी को यही हार्दिक शुभकामनायें

Saturday, December 27, 2008

ये रिश्ते

ये रिश्ते
ये रिश्ते लगते हैं मुझे रंग बिरंगे की़मती कपड़ों के छोटे छोटे टुकडे़,
खूब सुहाने खूब रेशमी खूब मखमली/ हर टुकडा़ दिल से लगाने को जी चाहे
एक को छोडूं दूसरा उठाउं,दूसरा छोडूं तीसरा,लेकिन हर टुकडा़
लगता है मुझे खूब काम का,
रोज़ थैली खोल कर उन्हें देखती हूं,खुश होती हूं,योजना बनाती हूं
लेकिन ये चिन्दे इतने छोटे हैं कि मैं इन्हें कभी किसी उपयोग में नही ले सकी.
सालों हो गये मुझे ये खूबसूरत की़मती लेकिन अनुपयोगी चिन्दों को सम्भालते सम्भालते,
अभी तक एक भी चिन्दा मेरे कुछ काम न आया.
जोड़ तोड़ कर चादर बनी फ़िर भी छोटी
नीचे खींचू तो सिर उघड़ता है,
सर छुपाउं तो अपनी ही जांघ उघड़ती है

Wednesday, December 24, 2008

मानव होने का अनुभव ( कविता )

मानव होने का अनुभव
सिर्फ़ जन्म लेना और फ़िर मर जाना नहीं है.
मानव होना यानी मिट्टी पानी अग्नि वायु और
आकाश होना है,
मिट्टी हो यदि तुम तो फ़िर उगने दो अपने अंदर
प्यार के बीज,ममता की फ़सलें,और भाईचारे की बालियां
अपनेपन के फ़ूलों की, और खुद तुम्हारी अपनी
सौंधी सौंधी महक उठने दो,
फ़िर अनुभव करो कि तुम मानव हो.
यदि अग्नि हो तुम तो जला दो मनमुटाव
दूरियां और इन्सान इन्सान के बीच का भेदभाव,
तड़का दो ऐसे सारे बरतन जिनमें
वैमनस्य का ज़हर उबल रहा है,
पकने दो मन की हांडी में प्यार की खिचड़ी
जलने दो ये मुहब्बत की आग मंद मंद यूं ही
फ़िर अनुभव करो कि तुम मानव हो.
पानी अगर हो तुम तो घुलने दो रंग सारे के सारे
सुख के दुख के,बह जाओ उसी तरफ़ जिधर प्यासे अधर पुकारे
पूरी धरती के सीने पर हैं लाखों सूखे गहरे गड्ढे
समा जाओ उनमे गहरे गहरे तक
होंटों के रस्ते दिल मे उतर कर अमर हो जाओ
जब हर सूखे अधर पर
तुम्हारे गीले अधरों का अहसास हो
तब अनुभव करो कि तुम मानव हो
अगर तुम वायु हो तो उडा़ ले जाओ
कटी पतंगों को हरे भरे पेडो़ की
उन डालियों तक जहां उनका प्रेम बसेरा हो जाये
उडा़ के ले जाओ गर्द नफ़रत की और बादल दुख के
ज़िंदगी की छत पर आंसुओं से भीगी चुनरिया टंगी है
आओ उसे अपने प्यार के झोंकों से सुखा दो
फ़िर वह लहरा लहरा कर
तुम्हारे बदन से लिपट लिपट जाये
तो फ़िर अनुभव करो कि तुम मानव हो
अगर आकाश हो तुम तो फ़िर उड़ने दो
अपनी विशाल बाहों में अरमानों के पंछी
उठा लो अपने सीने पर सारे ग्रह नक्षत्र
जड़ लो अपने माथे पर चांद और सूरज
औढ़ लो सितारों की चादर
और फ़िर निहारो अपना प्रतिबिम्ब
धरती पर फ़ैले प्यार के सागर में
और फ़िर अनुभव करो कि तुम मानव हो

गीत- बोलो हमसे ज़रा मीठी बोली

वतन के दुश्मनों के नाम सद्भभावना और इन्सानियत का सन्देश

बोलो हमसे ज़रा मीठी बोली
काहे हरदम चलाते हो गोली

तुम्हरी तलवार हमरी कटारी
दोनों बैरी हैं दोनो शिकारी
साथ छूटे जो इन बैरनों का
गुल खिलायेगी चाहत हमारी
शहद बन जायेगी हर निबोली
बोलो हमसे ज़रा मीठी बोली
काहे हरदम चलाते हो गोली

कल की पहचान बन जायें हम तुम
प्यार की शान बन जायें हम तुम
धर्म ज़ातों मे खु़द को न बांटें
काश इन्सान बन जायें हमतुम
खा़ली रहने न दो दिल की झोली
बोलो हमसे ज़रा मीठी बोली
काहे हरदम चलाते हो गोली

राजनीति लगाये निशाने
तीर खाते हैं हम सब दिवाने
ये समझ हमको आयेगी जिस दिन
लौट आयेंगे बीते ज़माने
आओ खेलें मुहब्बत की होली
बोलो हमसे ज़रा मीठी बोली
काहे हरदम चलाते हो गोली

Thursday, August 14, 2008

कविता

जिसने चाहा क़दम रख लिये
धूल उड़ी कांटे बिछे
लोग आते रहे जाते रहे
मंज़िल के निशाँ दिखाई ही नहीं दिए
ज़िन्दगी फ़िर जैसे एक  लम्बी राह हो गयी.
खूब करीने से सजा के रख्खा हाथों में, देर तक, रंग आने तक
और फ़िर खुरच खुरच कर गिरा दिया
ज़िन्दगी फ़िर जैसे हिना हो गयी.
तमाम रात सीने पर रख रख के पढ़ते रहे,
सोने के वरक थे चांदी की लिखावट,शब्द शब्द मोती
एक एक कर सारे पन्ने पलट गये
सुबह हुई किताब बन्द हो गयी
ज़िन्दगी फ़िर जैसे कहानी हो गयी.
हर धागे में एक मुराद बन्धी थी
हर गांठ पर एक नाम लिखा था
कितने सारे बन्धन बन्धे थे
सब मियादी थे,
मियाद खत्म होती रही बन्धन खुलते रहे
पर हर मुराद अधूरी ही रही
ज़िन्दगी फ़िर जैसे किसी मन्दिर की घंटी हो गयी.

Wednesday, August 13, 2008

ठूंठ ( कविता )

खड़ी थी मैं ना जाने कब से उस घने पेड़ तले
मैंने विश्वास किया था उसके लाखों पत्तों के स्नेह की ओट का
जो मुझे अपनेपन का अहसास कराती थी.
मगर मे अन्जान ही रह गयी
पता नही कब से रोज़ कुछ पत्ते
बिना पतझड़ और बिना हवा के ही गिरते रहे
मैंने विश्वास ही नहीं किया कि मेरा विश्वास और पत्ते यूं गिर रहे होंगे
आज अचानक जब कड़ी धूप ने मुझे झुलसाया
तो मैंने देखा कि मैं किसी घने पेड़ के नीचे नहीं
बल्कि एक ठूंठ के नीचे खडी़ हूं