Saturday, May 25, 2019

ग़ज़ल

अंदाज़ ज़िन्दगी का बदलने से क्या मिला
ए दोस्त तेरे पहलू में ढलने से क्या मिला
मिट्टी के वो शरीर तो मिट्टी को पा गए
चन्दन को उन चिताओं में जलने से क्या मिला
सायों में भी वो धूप का माहौल ही रहा
छाओं में हमको पेड़ की चलने से क्या मिला
पत्थर मिसाल शख़्स था पत्थर का ही रहा
कल रात हमको उसके पिघलने से क्या मिला
आवारगी से पांव के छालों ने पूछा है
घर छोड़ कर सड़क पे निकलने से क्या मिला
ए इंतज़ारे वस्ल मिरी सुब्ह को बता
कमरे में रातभर यूं टहलने से क्या मिला

Saturday, May 11, 2019

ग़ज़ल

सुबह की गोदड़ी में छुपाए रखे
रात के ख़्वाब दिन में सजाए रखे
रंजो ग़म दर्दे दिल और आहों फ़ुग़ाँ
बोझ हमने भी कितने उठाए रखे
रिश्ते नाते सभी दे रहे थे धुआं
उन चराग़ों को फिर भी जलाये रखे
कौन थे जिनको दुःख बांटते हम भला
दोस्त जो  भी थे वो सब भुलाये रखे
बारिशे अश्क़  से मिट  न जाये कहीं
वो जो काग़ज़ पे चेहरे बनाये रखे
काम आते हैं सोनी बुरे वक्त में
इसलिए खोटे सिक्के बचाये रखे 

Friday, April 19, 2019

मेरी राहों से कांटे हटाते रहे
लोग एहसान लेकिन जताते रहे
बन्द होंटों से मैं मुस्कुराती रही
वो मुहब्बत से मुझको मनाते रहे
आज के रंग भरकर निगाहों में हम
कल की तस्वीर दिलकश बनाते रहे
लोग भरकर निगाहों में चहरा मिरा
हाथ ज्योतिष को अपना दिखाते रहे
अपने मतलब की ख़ातिर हमेशा ही वो
झूठी कसमें मेरे सर की खाते रहे
लोग पाताल से पानी लेे आए हैं
हम पतंगों के पेंच लड़ाते रहे

Wednesday, January 16, 2019

जिनकी नज़रों में अजनबी से हैं

जिनकी नज़रों में अजनबी से हैं
 देखने में वो आदमी से हैं

बात जो कर रहे हैं  रहबर की
मुतमइन क्या वो रहबरी से हैं

महके महके  ये सिलसिले गुल के
क़ाबिले दीद  ताज़गी  से हैं

जब से गर्दिश ने हमको घेरा है
शहर में अपने अजनबी से हैं

अहले दिल की नज़र में  हम अब भी
खूबसूरत हसीं परी से हैं

जो के ख़ुर्शीदे इश्क से फूटी
हम मुनव्वर वो रौशनी से हैं

हम तो  गुमनाम  दोस्ती से हैं
लोग मशहूर दुश्मनी से हैं 

उसके जलवे जहाँ बिखरते हैं

उसके जलवे जहाँ बिखरते हैं
चलो हम भी वहां ठहरते हैं

उनके लहजे में फूल झरते हैं
वो जो उर्दू में बात करते हैं

उसके दीवाने उसके कूंचे से
नाचते झूमते गुज़रते हैं

दुज निगाही से देखने वाले
अब इशारों में बात करते हैं

ख़्वाब बिखरे हैं इस तरह जैसे
आईने टूट  कर  बिखरते हैं

झील सी आँख में अनीता की
डूबने वाले कब उबरते हैं


माँ बुलाती है

जब कभी याद उस की आती है
नींद अश्कों में डूब जाती है

बे नियाज़ी कुम्हार की मुझको
चाक पे रख के भूल जाती है

दिल की दुनिया उजाड़ कर क़िस्मत
शोख़ बच्ची सी खिलखिलाती है

हिचकियाँ नीम शब में चलने से
हसरते वस्ल सर उठाती है

जब भी बचपन में लौटती  हूँ मैं
ऐसा लगता है माँ बुलाती है

क्या करूँ तर्के तअल्लुक़ का गिला
डाल जामुन की टूट जाती है

सोनी आवारह  वो नज़र तौबा
आते जाते मुझे सताती है

अहसान भुला देता है.

ज़ख़्म मरहम का जब अहसान भुला देता है.
दरे अहसास से फिर दर्द सदा देता है

चलने लगती है जो आवारह हवा की तरह
ऐसी कश्ती  को तो दरिया भी सजा देता है

अहले जर्मन की वो तारीख़ उठा कर देखो
जज़्बए बाहमी  दीवार गिरा देता है

ऐसे कमज़र्फ के एहसां से बचाना या रब
सरे बाज़ार  जो औक़ात बता देता है

दाब कर पांव जो माँ बाप के ख़ुश होते हैं
आसमां ऐसे ही बच्चों को सिला देता है

सोनी इस तर्केतअल्लुक़ से बचाना खुद को
ये मरज़ मौत की तस्वीर बना देता है

Monday, October 15, 2018

ग़ज़ल - दर्द की रात को तुमने कभी घटते देखा

फूल के जिस्म से तितली को लिपटते देखा 
रंग और रूप को आपस में सिमटते देखा 

याद आया है मुझे वस्ल का आलम अपना 
जब भी लहरों को किनारों से लिपटते देखा 

दर्द के मारे हुए लोगों से मैं पूछती हूँ 
दर्द की रात को तुमने कभी घटते देखा 

आदमियत ने मेरी खून के आंसू रोये 
जब भी मज़्लूम पे ज़ालिम को झपटते देखा 

अबके भी नाम थे सोहकारों के फसलों पे लिखे 
अब के भी फ़सलों को सोहकारों में बंटते देखा 

जिनके हाथों में रहा अम्न का परचम सोनी 
उनके हाथों ही से इंसान को कटते देखा 


ग़ज़ल - आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक

शाम से इक इनायत की नज़र होने तक 
मुंतज़िर तेरे रहे हम तो सहर होने तक 

मुख़्तसर पल है जिसे ज़ीस्त कहा जाता है 
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक 

लज़्ज़ते इश्क़ की इक शाख़ें गुलेतर की तरह 
 परवरिश कीजियेगा दर्दे जिगर होने तक 

हिज़्र की शब में तेरी याद बसा कर दिल में 
शम्अ से जलते रहे हम तो सहर होने तक 

ए ग़मे दिल मेरी ठहरी हुई सांसों का इलाज 
तू ही कुछ करदे मसीहा को ख़बर होने तक 

सोचती रहती हूँ सोनी मैं यही शामों सहर 
राह  दुश्वार ना  हो ज़ादे सफ़र होने तक 

ग़ज़ल - अब मैं तेरे वजूद की पुख़्ता असास हूँ

ज़ीनत तेरे बदन की हूँ तेरा लिबास हूँ 
अब मैं तेरे वजूद की पुख़्ता असास हूँ 

माना के रात दिन मैं तेरे आस पास हूँ 
लेकिन तेरे सुलूक़ से हर पल उदास हूँ 

मेहरूम तेरे प्यास की लज़्ज़त से जो रहा 
मैं ही वो बदनसीब छलकता गिलास हूँ 

रंगीनिये जहान से महरूम मैं रही 
चरखे के पास जो न गया वो कपास हूँ 

तर्के ताल्लुक़ात के बारे में क्या कहूँ 
गिरते हुए मकान की सोनी असास हूँ  

ग़ज़ल - गुमां से भी नाज़ुक यकीं हम रहे थे

गुलाबों से बढ़कर हसीं हम रहे थे 
तुम्हारी नज़र में हमी हम रहे थे 

कभी याद बनकर कहीं दर्द बनकर 
तुम्हारे जिगर में कहीं हम रहे थे 

तुझे कुछ ख़बर है तेरी अंजुमन में 
गुमां से भी नाज़ुक यकीं हम रहे थे 

मुसाफ़िर जहाँ पर ठहरते नहीं हैं 
वही एक तपती ज़मी हम रहे थे 

जो ख़ाली पड़ा है सराये की सूरत 
उसी दिल के अंदर कहीं हम रहे थे 

ग़ज़ल - मेरी रातों का दो हिसाब मुझे

बेवफ़ा के सिवा जनाब मुझे 
और क्या देते तुम ख़िताब मुझे 

तुम वो ही हो जो रोज़ कहते थे 
एक खिलता हुआ गुलाब मुझे 

तुम समझते रहे हमेशा ही 
एक बोसीदा सी किताब मुझे 

हाथ रखिये न मेरे होंठों पर 
बोलने दीजिये जनाब मुझे 

तुमने ज़हमत न की सहारे की 
घेरे रहते थे जब अजाब मुझे 

तुम तो लिक्खे पढ़े से हो साहिब 
मेरी रातों का दो हिसाब मुझे 

होश बाक़ी नहीं रहे सोनी 
इस कदर अब पिला शराब मुझे 

ग़ज़ल - हरेक इंसान ख़ुशबू दे रहा है

तुम्हारा ध्यान ख़ुशबू दे रहा है 
यही लौबान ख़ुशबू दे रहा है 

करो पेहचान यारी दुश्मनी की 
हरेक इंसान ख़ुशबू दे रहा है 

गुलाबों से खिले हैं घाव दिल से 
तिरा अहसान ख़ुशबू दे रहा है 

महक पहुँची है उन तक मेरे दिल की 
मिरा अरमान ख़ुशबू दे रहा है 

मुहब्बत की वफ़ा की दोस्ती की 
ये हिंदुस्तान ख़ुशबू दे रहा है 

करप्शन है बहुत  लेकिन दिलों मैं 
अभी ईमान ख़ुशबू दे रहा है ग़ज़ल 

ग़ज़ल - चेहरे को मेरे मीर का दीवान मान लो

तुमको ख़ुदा बनाया मेरी जान मानलो 
कुछ तो मेरी निगाह का अहसान मान लो 

दुनिया की ये हवस न सताए तुम्हे कभी 
गर ख़ुद को चंद रोज़ का मेहमान मान लो 

क़िरदार पर वो दाग़ हैं जीना मुहाल है 
फिर भी ये ज़िद है साहिबे ईमान मान लाओ 

अपनी उदासियोंकी नुमाइश मैं क्या करूँ 
चेहरे को मेरे मीर का दीवान मान  लो 

इस मुल्क़ की भलाई फ़क़त एकता में है 
फ़िरक़ापरस्तों वक्त का फ़रमान मान लो 

झगड़े ये धर्म ज़ात के हो जाएँ तय अभी 
तुम सबको अपने जैसा जो इंसान मान लो 

सोनी चमन में फूल मयस्सर नहीं अगर 
ज़ख़्मों को ही बहार का वरदान मान लो 

ग़ज़ल - लिक्खी हैं मेरे दिल पे तेरी बातें बहुत सीं

याद आयीं किसी से जो मुलाक़ातें  बहुत सीं  
गुज़री मेरी आँखों से भी बरसातें बहुत सीं 

बैठूं जो सुनाने तो फिर इक उम्र गुज़र जाये 
लिक्खी हैं मेरे दिल पे तेरी बातें बहुत सीं  

ए चाँद ठहर रात के तू साथ ना जाना 
करनी है तेरे साथ अभी बातें बहुत सीं 

 कुछ दिन की जुदाई है सदा को नहीं बिछड़े 
बाक़ी हैं अभी अपनी मुलाक़ातें  बहुत सीं 

बाबा मेरा मुफ़लिस था  मैं बैठी रही घर में 
आयीं तो मेरे घर पे भी बारातें  बहुत सीं 

उन जागती रातों को भुलाऊँगी मैं कैसे 
गुज़री हैं तेरे बिन जो मेरी  रातें बहुत सीं 

लौट आएंगे परदेस से घर अबके वो सोनी
गुज़रेंगी अभी साथ में  बरसातें बहुत सीं  
  

ग़ज़ल - मैं ए मालिक किनारा चाहती हूँ

क़रीब आ प्यार का इज़हार कर दे 
मुझे छू ले  मुझे  गुलज़ार  कर दे 

मैं ए मालिक किनारा चाहती हूँ 
मेरे कच्चे घड़े  को पार कर दे 

चमकती है मेरे बालों में चांदी 
बहुत मुमकिन है वो इंकार कर दे 

अभी तक ख़्वाब  हूँ तेरी नज़र का 
मेरे मंज़र मुझे साकार कर दे 

वो जिसमे प्यार की खबरें  छपी हों 
मेरे चेहरे को वो अख़बार कर दे 

दुआ है लीडरों के हक़ में भगवन 
इन्हें  थोड़ा सा बा किरदार कर दे 

हमें  ख़ुश्बू बना दे ए  रचेता 
ये दुनिया बे दरो दीवार कर दे 

उदासी बन गयी मेरा  मुक़द्दर 
कोई आकर मेरा शृंगार कर दे 

मुहब्बत की वसीयत लिखने वाले 
मुझे भी इसमें कुछ हक़दार कर दे 

परींदे प्यार के कुछ उड़ रहे हैं 
ख़ुदा जाने वो कब लाचार कर दे 

सदा लड़ना अनीता उस हवा से 
जो सारे शहर को बीमार कर दे 

Sunday, October 14, 2018

ग़ज़ल -उकता के लड़कियों को न घर से निकालिये

ससुराल से दुखी थे मगर मुस्कुरा लिए 
पूछा जो माँ  ने हाल तो आँसू छुपा लिए 

ज़ेवर जो हो कोई तो उजलवा के पहन लें 
तकदीर हो सियाह तो  कैसे उजालिये 

रिश्ते हों बेटियों के तो कुछ देखभाल कर 
उकता के लड़कियों को न घर से निकालिये 

ताबीरें आप ढूंढ़ने आये हैं देर से 
अपने तमाम ख़्वाब हमीने जला लिए 

अब ये भी चाहते हैं मुहब्बत की बात हो 
 पहले तो तीर तंज़ के तुमने चला लिए 

 

ग़ज़ल - क्षमा मैं मांगती उससे अगर ख़ता करती

मैं कैसे अपनी कहानी की इप्तिदा करती 
तुम्हें ना माँगती रब से तो और क्या करती 

मेरी हया पे तुम्ही कल को तब्सरा करते 
जो लड़की हो के भी मैं अर्ज़े मुद्दुआ करती 

मैं सच कहूं मुझे तारीफ़ अच्छी लगती है 
वो चाँद कहते मुझे और मैं सुना करती      

दिनों के बाद वो लौटा तो खूब प्यार किया 
अब ऐसे प्यार के मौसम में क्या गिला करती 

बना के फूल वो ले जाता मुझको दफ़्तर में 
तमाम  दिन भी उसे ख़ुशबुएं दिया करती  

अब उसका काम है मुझको मना के ले जाना 
क्षमा मैं मांगती  उससे अगर ख़ता करती 

ये फूल मेरे लिए ही तो रोज़ खिलते हैं 
मैं इनसे प्यार ना करती तो और क्या करती 

न बाप ज़िंदा न घर में जहेज़ का सामान 
वो अपनी बच्ची को किस तरह से विदा करती 

वो भाई बहनों की रोटी की आस है सोनी 
वो क़त्ल करके उन्हें किस तरह विदा करती 



ग़ज़ल - सजा रही हूँ मैं आँसूं अभी तो कागज़ पर

 हसीन अजनबी आँखों का  ख़्वाब होने में 
लगेगा वक्त मुझे बेनक़ाब  होने में 

ज़रा सा दिल की लगी का भी हाथ होता है 
किसी के जीतने में कामयाब होने में 

सजा रही हूँ मैं आँसूं अभी तो कागज़ पर 
अभी तो वक़्त लगेगा किताब होने में 

सफर बहार का आसान ना समझना तुम 
बहुत से ज़ख़्म मिलेंगे गुलाब  होने में 

वो देख ले मेरे घर आके चांदनी का पड़ाव 
जिसे भी शक हो मेरे माहताब होने में 

ये जानते हुए वो आँख मूँद लेते हैं 
है किसका हाथ फ़िज़ा के ख़राब होने में 

हज़ारों आग के दरिया हैं दरमियाँ सोनी 
बहुत समय  है मुझे आफ़ताब होने में 



ग़ज़ल - धूप का आकाश जैसे माँ का आँचल हो गया

देखकर मुझको ह्रदय मौसम का चंचल हो गया 
होश खो बैठे हैं तारे चाँद पागल हो गया 

जाने कैसे प्यार उसका बन गया बिंदिया मेरी 
जाने कैसे वो मेरी आँख का काजल हो गया 

उससे था जन्मों का रिश्ता साथ कैसे छूटता 
मैं जो नदिया बन गयी वो प्यासा बादल हो गया 

फिर दुखों की राह में माँ की दुआ काम आ गयी 
धूप का आकाश जैसे माँ का आँचल हो गया 

आपके स्पर्श ने मुझको मुकम्मल कर दिया 
आपके छूने से सारा जिस्म संदल हो गया 

वो थे जब सोनी तो दिल का ये नगर आबाद था 
वो गए तो घर मेरा वीरान जंगल हो गया