Thursday, July 26, 2018

क़ुदरत के इन हसीन नज़ारों को चूम लूँ

ग़ज़ल

क़ुदरत के इन हसीन नज़ारों  को चूम लूँ
जी चाहता है चाँद सितारों को चूम लूँ

काग़ज़  की एक छोटी सी कश्ती में बैठ कर
बहती हुई नदी के किनारों को चूम लूँ

काली घटा की ओढ़नी सूरज पे डाल कर
सावन की सब्ज़ सब्ज़ बहारों को चूम लूँ

फूलों की अंजुमन में जो जाना नसीब हो
तितली की तरह मैं भी बहारों  को चूम लूँ

सोनी हवा के डोले पे होकर सवार मैं
बारिश की हल्की हल्की फुहारों को चूम लूँ 

Tuesday, March 8, 2016

है राम जो अबके आना सीता को दुःख मत देना 
क़सम  तुम्हे रामायण की सातों ही जनम निभा लेना।  है राम

नारी के बिन नारायण कैसे कहला पाओगे 
कितने जन्मों तक सोने की सीता बनवाओगे 
बिन नारी जीवन, घर सूना, कैसे जगत चलाओगे। है राम 

पत्थर को नारी  करने वाले पत्थर बन बैठे 
नैन मूँद कर ले लिए भगवन मर्यादा के ठेके 
अपने ही अंतर्मन को आखिर कब तक ठुकराओगे।  है राम 

तुमने नारी को ये कैसी प्रीत की शिक्षा दी है 
नारी ने ही दुनिया में क्यों अग्नि परीक्षा दी है 
ओ दुनिया के पुरुषों कब तक नारी चिता सजाओगे।  है राम 





Saturday, May 2, 2015

चाँद पागल हो गया { ग़ज़ल }

बेख़बर सोती रही तो चाँद पागल हो गया
इस तरह की दिल्लगी तो चाँद पागल हो गया

रौशनी मेरे बदन की रात के पिछले पहर
चांदनी सी खिल गयी तो चाँद पागल हो गया

रात भर आकाश पर काली घटा छाती रही
जब हवा ठंडी चली तो चाँद पागल हो गया

रात की रानी सी ख़ुशबू  शाम के ढलने के बाद
मेरी ज़ुल्फ़ों से उड़ी तो चाँद पागल हो गया

रूठ कर बादल चले हैं रूठ कर तारे चले
रूठ कर बदली चली तो चाँद पागल हो गया

रात की तन्हाइयों की बात सोनी सुब्ह दम
शोख़ लहजे में कही तो चाँद पागल हो गया 

मनहरण घनाछरी छंद

कहत सुनत नहीं, लगत अनत नहीं,लगन लगी है ऐसी, मन घनश्याम की।
मन मदन मोहन, रंगरसिया सजन,बखानी न जाये छवि, ललित ललाम की।
छलक छलक अंग, यौवन कलश रस,काम की कमान बिन," सोनी" किस काम की।
बजे बांसुरी की तान, गूंजे गोपियों के गान, अनुपम अलोकिक, छवि ब्रजधाम की।    

प्रेम की मथुरा

मेरे जीवन के पतझड़ में तेरा मुखड़ा तो सावन है
कभी तू राम है मेरा  कभी छलिया मनभावन है 
बसो मन मीत  बनकर गीत मेरे मन के  मंदिर में 
मेरा मन प्रेम की मथुरा और अधरों पे  वृंदावन  है 

याद में उसकी पागल है

बहे जो आँख से आँसू मुहब्बत में गंगाजल है
तड़पता है ये दिल मेरा याद में उसकी पागल है
बहुत है धूप, मंज़िल दूर, तन्हा राह उल्फ़त  की
मेरी क़िस्मत में क्या कोई प्यार का प्यासा बादल है





गीत

अपनी ज़मीन पर आँसू बहुत हैं ख़ुशियाँ हैं कम
ख़ुशियाँ बाँट लें आजा भुला दें दुनियाँ  के ग़म  

घिर आये रे दुक्ख के मौसम
हुआ जाता है मौसम ये बोझल
मुस्काने सारी धोने से पहले
आ जाओ हम ख़ुशियाँ बाँट लें। आजा भुला दें ....

हो चलो चलकर मुहब्बत बचाएं
वक़्त है आदमियत बचाएं
इंसानियत की ये इल्तज़ा है
मिल जुल के हम ख़ुशियाँ बाँट लें।  आजा भुला दें …

हम तो पंछी हैं इक आसमाँ  के
दो ये आवाज़ सारे जहाँ से
कहते हैं हम से  दुनियाँ के सारे
 दीनो धरम ख़ुशियाँ बाँट लें। आजा भुला दें …

अब के यूँ आये जीने का मौसम
सबको मिल जाये जीने का मौसम
सपनों की जन्नत बन के हक़ीक़त
चूमें क़दम ख़ुशियाँ बाँट लें।  आजा भुला दें …

कोई उजड़े घरों को न रोये
कोई अपने चहेते न खोये
अब दिन  न आये आँखें किसी की
करने का नम ख़ुशियाँ बाँट लें।  आजा भुला दें …

अपनी जन्नत को जलने न देंगे
दिन को शब में बदलने न देंगे
तुझको अँधेरे डसने खड़े हैं
थम यार थम खुशियां बाँट लें।  आजा भुला दें …


Thursday, December 22, 2011

प्रणय का दीप

पिया ने प्रीत की पायल मुझे कुछ ऐसी पहनाई
प्रणय का दीप देहरी पर सजाने मैं चली आई

ये बादल ज़ुल्फ़ मेरी देख मुंह अपना छुपाता है
की सूरज मांग भरने लालिमा लेकर के आता है
चाँद भी देखकर मुझको सदा नज़रें चुराता है
आसमां मेरे कदमों में सितारों को बिछाता है
मुझसे पूछ कर चलती है पिछवा और पुरवाई
प्रणय का दीप ........

मैं सागर से मिलूंगी मिल के सागर को खंगालूंगी
सीप के गर्भ से गर्वीले मोती को निकालूंगी
मैं राही प्रेम पथ की हूँ प्रबल संवेदना की हूँ
मुझे मत रोकना सरिता उमड़ती भावना की हूँ
मिलन की रागिनी मैंने पिया के अधरों से गाई
प्रणय का दीप .........

मैं तेरी ही कविता हूँ मैं तेरी ही समीक्ष! हूं
देह के व्याकरण में प्रेम के छंदों की शीक्ष! हूं.
मैं तेरा प्रश्न भी उत्तर भी हूं तेरी परिक्ष! हूं
अहिल्या ने जो की थी राम की मैं वो प्रतिक्ष! हूं
छुअन के वास्ते प्रियतम युगों से मैं हूं पथराई
प्रणय का दीप ......
( maf kijiyega is geet ke aakhri band me ek akchhar me mujhe aa ki matra lagana nahi aayi. aap khud samjhj gaye honge .dhanyavad)

Monday, February 16, 2009

चांद जल जाए ग़ज़ल

इक ज़रा धूप जो निकल जाए
बर्फ़ ग़म की अभी पिघल जाए

ऐसा चेहरा है मेरी आंखों में
चांद देखे तो चांद जल जाए

एक कांटा जो दिल के अंदर है
दिल से निकले तो दम निकल जाए

उसको ठोकर सलाम करती है
बाद गिरने के जो सम्भल जाए

ज़ख्मे दिल वो चराग़ हैं सोनी
शाम से पहले ही जो जल जाए

Wednesday, December 31, 2008

नया साल मंगलमय हो

हाथ जब मिलाना हो दिल भी साथ रख लेना
दिल अगर नहीं मिलते दोस्ती अधूरी है
नये साल में आप सभी को यही हार्दिक शुभकामनायें

Saturday, December 27, 2008

ये रिश्ते

ये रिश्ते
ये रिश्ते लगते हैं मुझे रंग बिरंगे की़मती कपड़ों के छोटे छोटे टुकडे़,
खूब सुहाने खूब रेशमी खूब मखमली/ हर टुकडा़ दिल से लगाने को जी चाहे
एक को छोडूं दूसरा उठाउं,दूसरा छोडूं तीसरा,लेकिन हर टुकडा़
लगता है मुझे खूब काम का,
रोज़ थैली खोल कर उन्हें देखती हूं,खुश होती हूं,योजना बनाती हूं
लेकिन ये चिन्दे इतने छोटे हैं कि मैं इन्हें कभी किसी उपयोग में नही ले सकी.
सालों हो गये मुझे ये खूबसूरत की़मती लेकिन अनुपयोगी चिन्दों को सम्भालते सम्भालते,
अभी तक एक भी चिन्दा मेरे कुछ काम न आया.
जोड़ तोड़ कर चादर बनी फ़िर भी छोटी
नीचे खींचू तो सिर उघड़ता है,
सर छुपाउं तो अपनी ही जांघ उघड़ती है

Wednesday, December 24, 2008

मानव होने का अनुभव ( कविता )

मानव होने का अनुभव
सिर्फ़ जन्म लेना और फ़िर मर जाना नहीं है.
मानव होना यानी मिट्टी पानी अग्नि वायु और
आकाश होना है,
मिट्टी हो यदि तुम तो फ़िर उगने दो अपने अंदर
प्यार के बीज,ममता की फ़सलें,और भाईचारे की बालियां
अपनेपन के फ़ूलों की, और खुद तुम्हारी अपनी
सौंधी सौंधी महक उठने दो,
फ़िर अनुभव करो कि तुम मानव हो.
यदि अग्नि हो तुम तो जला दो मनमुटाव
दूरियां और इन्सान इन्सान के बीच का भेदभाव,
तड़का दो ऐसे सारे बरतन जिनमें
वैमनस्य का ज़हर उबल रहा है,
पकने दो मन की हांडी में प्यार की खिचड़ी
जलने दो ये मुहब्बत की आग मंद मंद यूं ही
फ़िर अनुभव करो कि तुम मानव हो.
पानी अगर हो तुम तो घुलने दो रंग सारे के सारे
सुख के दुख के,बह जाओ उसी तरफ़ जिधर प्यासे अधर पुकारे
पूरी धरती के सीने पर हैं लाखों सूखे गहरे गड्ढे
समा जाओ उनमे गहरे गहरे तक
होंटों के रस्ते दिल मे उतर कर अमर हो जाओ
जब हर सूखे अधर पर
तुम्हारे गीले अधरों का अहसास हो
तब अनुभव करो कि तुम मानव हो
अगर तुम वायु हो तो उडा़ ले जाओ
कटी पतंगों को हरे भरे पेडो़ की
उन डालियों तक जहां उनका प्रेम बसेरा हो जाये
उडा़ के ले जाओ गर्द नफ़रत की और बादल दुख के
ज़िंदगी की छत पर आंसुओं से भीगी चुनरिया टंगी है
आओ उसे अपने प्यार के झोंकों से सुखा दो
फ़िर वह लहरा लहरा कर
तुम्हारे बदन से लिपट लिपट जाये
तो फ़िर अनुभव करो कि तुम मानव हो
अगर आकाश हो तुम तो फ़िर उड़ने दो
अपनी विशाल बाहों में अरमानों के पंछी
उठा लो अपने सीने पर सारे ग्रह नक्षत्र
जड़ लो अपने माथे पर चांद और सूरज
औढ़ लो सितारों की चादर
और फ़िर निहारो अपना प्रतिबिम्ब
धरती पर फ़ैले प्यार के सागर में
और फ़िर अनुभव करो कि तुम मानव हो

गीत- बोलो हमसे ज़रा मीठी बोली

वतन के दुश्मनों के नाम सद्भभावना और इन्सानियत का सन्देश

बोलो हमसे ज़रा मीठी बोली
काहे हरदम चलाते हो गोली

तुम्हरी तलवार हमरी कटारी
दोनों बैरी हैं दोनो शिकारी
साथ छूटे जो इन बैरनों का
गुल खिलायेगी चाहत हमारी
शहद बन जायेगी हर निबोली
बोलो हमसे ज़रा मीठी बोली
काहे हरदम चलाते हो गोली

कल की पहचान बन जायें हम तुम
प्यार की शान बन जायें हम तुम
धर्म ज़ातों मे खु़द को न बांटें
काश इन्सान बन जायें हमतुम
खा़ली रहने न दो दिल की झोली
बोलो हमसे ज़रा मीठी बोली
काहे हरदम चलाते हो गोली

राजनीति लगाये निशाने
तीर खाते हैं हम सब दिवाने
ये समझ हमको आयेगी जिस दिन
लौट आयेंगे बीते ज़माने
आओ खेलें मुहब्बत की होली
बोलो हमसे ज़रा मीठी बोली
काहे हरदम चलाते हो गोली

Thursday, August 14, 2008

कविता

जिसने चाहा क़दम रख लिये
धूल उड़ी कांटे बिछे
लोग आते रहे जाते रहे
मंज़िल के निशाँ दिखाई ही नहीं दिए
ज़िन्दगी फ़िर जैसे एक  लम्बी राह हो गयी.
खूब करीने से सजा के रख्खा हाथों में, देर तक, रंग आने तक
और फ़िर खुरच खुरच कर गिरा दिया
ज़िन्दगी फ़िर जैसे हिना हो गयी.
तमाम रात सीने पर रख रख के पढ़ते रहे,
सोने के वरक थे चांदी की लिखावट,शब्द शब्द मोती
एक एक कर सारे पन्ने पलट गये
सुबह हुई किताब बन्द हो गयी
ज़िन्दगी फ़िर जैसे कहानी हो गयी.
हर धागे में एक मुराद बन्धी थी
हर गांठ पर एक नाम लिखा था
कितने सारे बन्धन बन्धे थे
सब मियादी थे,
मियाद खत्म होती रही बन्धन खुलते रहे
पर हर मुराद अधूरी ही रही
ज़िन्दगी फ़िर जैसे किसी मन्दिर की घंटी हो गयी.

Wednesday, August 13, 2008

ठूंठ ( कविता )

खड़ी थी मैं ना जाने कब से उस घने पेड़ तले
मैंने विश्वास किया था उसके लाखों पत्तों के स्नेह की ओट का
जो मुझे अपनेपन का अहसास कराती थी.
मगर मे अन्जान ही रह गयी
पता नही कब से रोज़ कुछ पत्ते
बिना पतझड़ और बिना हवा के ही गिरते रहे
मैंने विश्वास ही नहीं किया कि मेरा विश्वास और पत्ते यूं गिर रहे होंगे
आज अचानक जब कड़ी धूप ने मुझे झुलसाया
तो मैंने देखा कि मैं किसी घने पेड़ के नीचे नहीं
बल्कि एक ठूंठ के नीचे खडी़ हूं

Monday, July 14, 2008

देखते हैं

गुफ़्तगू को बदल के देखते हैं
उसके लहज़े मैं ढल के देखते हैं

माहिरे हुस्न भी मुझे अब तो
सोच अपनी बदल के देखते हैं

राज़ खुश्बु का जानने के लिये
लोग गु्ल को मसल के देखते हैं

कितनी दुश्वार राहे उल्फ़त है
दो क़दम हम भी चल के देखते हैं

हासिले इश्क हाथ मलना है
तो चलो हाथ मल के देखते हैं

शौलये तूर है अनीता वो
लोग उसको सम्भल के देखते हैं

Tuesday, February 19, 2008

गीत- मैं तो राधा बन जाउंगी

मन मंदिर के शिखर कलश से प्रेम सुधा बरसाना
मैं तो राधा बन जाउंगी तुम कान्हा बन जाना

याद बहुत आते हैं मुझको उन बाहों के झूले
मन करता है इस अंबर के कोने कोने छूलें
छुअन तुम्हारी चंदन जैसी मन पावन हो जाये
दो पल दूर रहो तो आंखों में सावन घिर आये
मेरे आंचल में सर रख कर मुरली मधुर बजाना. मन मंदिर के...

पत्थर पत्थर देव करुंगी मैं ये मान करुंगी
सात जनम तक तुझको पाउं मोती दान करुंगी
तू जो मिल जाये इक पल तो जीवन आज संवारूं
नैंनो के जमुना जल से नित तेरे चरण पखारूं
रोम रोम व्रन्दावन गोकुल मन मेरा बरसाना. मन मंदिर के...

तेरी याद के झोंकों से मन के पट हिलते डुलते
पोर पोर पर प्रेम निमंत्रण रखे हुए हैं कब से
सजन तुम्हारी लगन लगी यूं जैसे अगन गगन में
बदरा भी बरसे ऎसे जैसे घी बरसे हवन में
मैं समिधा सी जलती रहूं तुम पूर्णाहुति बन जाना. मन मंदिर के...

Sunday, February 17, 2008

गीत- चाहत का इक़रार किया

अपनी पहली चाहत का इक़रार किया
सुबह की उजली धूप ने मुझको प्यार किया

सर्द हवा ने तन को मेरे सहलाया
छुई मुई सी सिमट गयी मेरी काया
कितने सोये जज़्बों को बेदार किया . सुबह की...

बगिया में सब फ़ूल इशारे करते हैं
खुशबु के शहज़ादे मुझ पर मरते हैं
चाहत की इस खुशबु ने बीमार किया. सुबह की...

प्रेम दिवाने चांद से इक दिन बात हुई
प्रेम अगन उस दिन से मेरे साथ हुई
फ़िर मैंने भी आग का दरिया पार किया. सुबह की...

मुझे बनाया प्रेम दिवानी मौसम ने
मेरी विनती एक ना मानी मौसम ने
किये बहाने कितना ही इन्कार किया. सुबह की...

नदिया बोली हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं बहती हूं तुम भी मेरे साथ बहो
मैंने हंसकर निमंत्रण स्वीकार किया. सुबह की...

ध्यान में उसके डूबी इतना खोयी मैं
हर दिन उसकी याद में जागी सोयी मैं
आंखें खोली उसका ही दिदार किया. सुबह की...

जोरा जोरी करके अबके होली में
रंग भरे सौ प्यार के मेरी चोली में
कैसा कैसा बैरी ने व्यवहार किया. सुबह की ...

मेंहंदी रंग जो लायी मेरे हाथों में
तब आया विश्वास पिया की बातों में
कुमकुम ने सच्चाई का इज़हार किया. सुबह की...

ना तो प्यार के सच्चे अब अफ़साने हैं
ना मजनूं से रांझे से दिवाने हैं
प्यार के नाम पे सबने ही व्यापार किया. सुबह की...

ग़ज़ल- जिगर में रहती है

सोच जब भी सफ़र में रहती है
तेरी सूरत नज़र में रहती है

जब कभी उस को सोचती हूं मैं
एक खु़श्बू सी घर में रह्ती है

बात वो जिसमे तन्ज़ की बू हो
फ़ांस बनकर जिगर में रहती है

ये बुज़ुरगों का कौल है साहिब
कामियाबी हुनर में रहती है

रूह मेरी तो आज कल सोनी
दर्दे दिल के असर में रह्ती है

बता किधर जाउं

पास से उसके जो गुज़र जाउं
शर्म के मारे मैं तो मर जाउं

सोचती हूं के ऎसा कर जाउं
उसके नज़दीक से गुज़र जाउं

हो इज़ाज़त तो आप के दिल में
उम्रभर के लिये ठहर जाउं

इक तरफ़ इश्क इक तरफ़ दुनिया
जज़्बए दिल बता किधर जाउं

कर ले इकरार प्यार का मुझ से
इससे पहले के मैं मुकर जाउं

अपने दिल में समेट लेना मुझे
टूट कर जब कभी बिखर जाउं

तू पतंग और डोर मैं ठहरी
तू जिधर जाये मैं उधर जाउं