Monday, September 17, 2007

किसकी नज़र ने

किसकी नज़र ने चांद के जैसा किया मुझे
हैरत से आज आइना देखा किया मुझे

वो शख़्स अपने आपमें पारस मिसाल था
पलभर में जिसके लम्स ने सोना किया मुझे

बारिश में सर से पाँव तलक जल रही हूँ मैं
सावन की इस फुआर ने शोला किया मुझे

वो शख़्स आज गुम है ग़मे रोज़गार में
फुरसत के रात दिन में जो सोचा किया मुझे

देकर दगा फ़रेब मोहब्बत के नाम पर
ए दोस्त तूने वाकफ़े दुनिया किया मुझे

मैं कब कश्ती डुबोना

मैं कब कश्ती डुबोना चाहती थी
नदी के पार होना चाहती थी

वहाँ कुछ ख़्वाब हैं आराम फ़रमा
मैं जिन आंखों में सोना चाहती थी

बिछड़ते वक्त सबसे छुप के मैं भी
लिपटकर उससे रोना चाहती थी

मैं उससे ख़्वाब में मिलने की खातिर
ज़रा सी देर सोना चाहती थी

मैं अपनी उल्फ़तों की फ़स्ल सोनी
तेरी आंखों में बोना चाहती थी

Sunday, September 16, 2007

नज़र से गुजरने लगा

दिल की नाज़ुक रगों से गुज़रने लगा
दर्द तो रूह में अब उतरने लगा

चांद अपना सफ़र खत्म करने लगा
चांदनी रात का ज़ख्म भरने लगा

मेरा चेहरा गिला मुझसे करने लगा
आइना टूट कर जब बिखरने लगा

मेरी आवाज़ पर जो ठहरता न था
मेरी आवाज़ पर वो ठहरने लगा

मैं चरागों के जैसी दहलने लगी
वो हवाओं के जैसा गुज़रने लगा

चाप क़दमों की जब भी सुनाई पडी
उसका चेहरा नज़र से गुज़रने लगा

जवान होने दो

ज़ख्मे दिल को जवान होने दो
दिल में कुछ तो निशान होने दो

मीठी मीठी सी नींद आएगी
और थोड़ी थकान होने दो

फ़स्ले गुल का लगान ठहराना
पहले उसको जवान होने दो

चोर जो दिल का है नज़र में है
पहले दिल को दुकान होने दो

फ़स्ल अश्कों की लहलहाएगी
दर्देदिल को किसान होने दो

Saturday, September 15, 2007

ज़ीनत तेरी बदन की

ज़ीनत तेरे बदन की हूं तेरा लिबास हूँ
अब मैं तेरे वजूद की पुख्ता असास हूँ

माना कि रात दिन मैं तेरे आसपास हूँ
लेकिन तेरे सुलूक से हर पल उदास हूँ

महरूम तेरी प्यास की लज़्ज़्त से जो रहा
मैं ही वो बदनसीब छलकता गिलास हूँ

रंगीनिये जहान से महरूम मैं रही
चरखे के पास जो न गया वो कपास हूँ

तर्के तआल्लुकात के बारे में क्या कहूं
गिरते हुए मकान की सोनी असास हूँ

मैं दिल में हूँ

अपने दिल में उतर मैं दिल में हूँ
मुझको मेहसूस कर मैं दिल में हूं

ढूँढता है किधर मैं दिल में हूं
अरे ओ कमनज़र मैं दिल में हूं

तेरे दिल पर न होने दूँगी कभी
ज़हरे ग़म का असर मैं दिल में हूं

ग़म के दरिया को पार करना है
थोड़ी हिम्मत तो कर मैं दिल में हूं

अपने दिल पर चला न यूँ खंजर
अरे ओ बेखबर मैं दिल में हूं

चांद पर एक दिन तो जाना है
चांद पर रख नज़र मैं दिल में हूं

रात है मैं हूँ

दर्दे पैहम है रात है मैं हूँ
आंख पुरनम है रात है मैं हूँ

शम्मा मद्धम है रात है मैं हूं
आंख में दम है रात है मै हूं

फ़िर वही अश्क से भरी आंखें
फ़िर वो ही ग़म है रात है मैं हूं

गर्द आलूद आईने की तरह
जु़ल्फ़ बरहम है रात है मैं हूँ

कहकशां चांद और तारों में
रौशनी कम है रात है मैं हूँ

लज़्ज़ते लम्स का बदन में मिरे
एक आलम है रात है मैं हूँ

वो ही रिसते हुए से ज़ख्मे जिगर
वो ही मरहम है रात है मैं हूँ

आज बुझते हुए चरागों का
घर में मातम है रात है मैं हूँ

गर्द उड़ती है हर तरफ सोनी
खु़श्क मौसम है रात है मैं हूं


Friday, September 14, 2007

पैगामे वस्ल



इक एक कर के बुझ गए उम्मीद के दिये
वो माँ हूँ जिसकी कोख में बच्चे नहीं जिये

पैगामे वस्ल जब भी तिरी आंख ने दिये
बिखरी है मेरी जुल्फ तेरी शाम के लिये

किरणें निकल रही थीं पसीने की बूँद से
पहलू में उसके बैठ के दो जाम क्या पिये

जब जब भी उसके आने की दिल को खबर मिली
आंखों में इंतज़ार के जलने लगे दिये

उम्मीद और बीम के दामन को थाम कर
अनजान एक शख्स के हम साथ चल दिये

सफ़ीना और समंदर









बदला बदला हवा का तेवर है
अब सफ़ीना है और समंदर है

मेरी नज़रों में हम नज़र के बग़ैर
झील सहरा है फूल पत्थर है

इश्क की मौज जिसको कहते हैं
इक दहकता हुआ समंदर है

कोई मंज़र हँसी नहीं भाता
वो उदासी नज़र के अन्दर है

जो मिला मुझको बेवफा ही मिला
सोनी मेरा भी क्या मुकद्दर है